प्राकृतिक खेती की मुहिम में जुटे राज्यपाल आचार्य देवव्रत

राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किसानों के बीच प्राकृतिक खेती की जागरूकता बढ़ाने के लिए बहुत काम किया है। इससे पहले भी हरियाणा और हिमाचल में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने हज़ारों किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा है।

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राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किसानों के बीच प्राकृतिक खेती की जागरूकता बढ़ाने के लिए बहुत काम किया है। इससे पहले भी हरियाणा और हिमाचल में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने हज़ारों किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में गुरुकुल में प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने वहां की ज़मीन पर रसायनिक खेती से होने वाले नुकसान को समझा और उसके विकल्प के रूप में जैविक खेती करनी शुरू की।

-मिनाक्षी शर्मा 

भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और कृषि इसका सबसे बड़ा हिस्सा है क्योंकि आज भी तकरीबन 50% जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। केंद्र सरकार कृषि और किसानों के लिए कई पहलें कर रही है।

गत 16 दिसंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात के आणंद में प्राकृतिक खेती पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान देश के सभी किसानों को संबोधित किया। प्रधानमंत्री किसानों को उत्पादकता बढ़ाने और रसायनों के इस्तेमाल को कम करने की सीख देते हुए प्राकृतिक खेती को अपनाने की सलाह दी।

उन्होंने कहा “हमें बीज से लेकर मिट्टी तक सभी प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग करके खेती को प्राकृतिक बनाना होगा जिससे उत्पादन अधिक और रसायनों पर हो रहा ख़र्च कम हो सके। उनका उद्देश्य प्राकृतिक खेती को जन आंदोलन बनाना है जिसके लिए केंद्र सरकार ज़ीरो बजट फार्मिंग के प्रचार के लिए एक कमेटी गठित करेगी।

प्रधानमंत्री की इस सीख को गुजरात बखूबी अपना आ रहा है। गुजरात ने देश के आर्थिक रथ के मज़बूत पहिये, कृषि और किसान के लिए नित नई पहल करने का प्रयास किया है। गुजरात सरकार, विशेषकर राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने किसानों के बीच प्राकृतिक खेती की जागरूकता बढ़ाने के लिए बहुत काम किया है। इससे पहले भी हरियाणा और हिमाचल में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने हज़ारों किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा है।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र में गुरुकुल में प्रधानाचार्य के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने वहां की ज़मीन पर रसायनिक खेती से होने वाले नुकसान को समझा और उसके विकल्प के रूप में जैविक खेती करनी शुरू की।

शुरुआती दौर में इतनी सफलता नहीं मिली लेकिन उन्होंने रसायनों के ज़हर से मुक्त खेती करने की ठान ली थी इसलिए उन्होंने कई कृषि वैज्ञानिकों से इस पर बात की। आखिरकार दो-तीन प्रयासों के बाद उन्हें इस कोशिश में सफलता मिली।

आचार्य देवव्रत ने रसायनिक, जैविक और प्राकृतिक, तीनों तरह की खेती की है लेकिन उन्होंने ये अनुभव किया कि जैविक खेती का इतना प्रचार होने के बावजूद वह इतनी सफल नहीं है लेकिन प्राकृतिक खेती का इतना प्रचार नहीं हुआ फिर भी वह अधिक सफल हो रही है।

इसके पीछे यह वजह थी कि जैविक खेती में किसान को बहुत अधिक मात्रा में गाय का गोबर और नाइट्रोज़न की आवश्यकता होती है। 150 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट तैयार करने में ही कई महीने लग जाते हैं। दूसरी तरफ़ प्राकृतिक खेती में ऐसी बाधाएं नहीं आती। इसकी खाद बनाने के लिए किसान को गाय का गोबर, गोमूत्र, गुड़ और चने का आटा चाहिए होता है। प्राकृतिक खेती में खाद के लिए जीवामृत का इस्तेमाल होता है। ये सारा सामान आपको अपनी रसोई में ही मिल जाता है और किसी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं होता।

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प्राकृतिक खेती से ना केवल भूमि की उर्वरता बढ़ती है बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी अच्छी है। प्राकृतिक खेती में कीटनाशकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फ़सल अवशेष और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे- रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं।

प्राकृतिक खेती में प्रकृति में उपलब्ध जीवाणुओं, मित्र किट और जैविक कीटनाशक द्वारा फ़सल को हानिकारक जीवाणुओं से बचाया जाता है। यह खेती किसानों के लिए इसलिए फायदेमंद होती है क्योंकि किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा कीटनाशक और कैमिकल्स के छिड़काव में ही चला जाता है। लेकिन प्राकृतिक खेती में किसान की कमाई बच जाएगी और गुणकारी सब्ज़ियां पैदा होंगी। कुल मिलाकर प्राकृतिक खेती किसान की कमाई, मिट्टी के उपजाऊपन और मनुष्यों की सेहत के लिए अच्छी होती है।

केंद्र सरकार आने वाले समय के लिए ज़ीरो बजट नैचुरल फार्मिंग के विज़न को प्रचारित कर रही है। नीति आयोग के मुताबिक इस वक्त देश में गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, तमिलनाडु, केरल के कई इलाकों में किसानों द्वारा प्राकृतिक खेती की जा रही है।

गुजरात का डांग देश का पहला ज़िला है जिसे 100% प्राकृतिक खेती ज़िला घोषित किया गया है। डांग में कम से कम 200,000 किसान प्राकृतिक खेती करते हैं।

डांग को पेस्टिसाइड से पूरी तरह मुक्त करने के लिए गुजरात सरकार ने 31 करोड़ रुपए की सहायता राशि किसान परिवारों में वितरित करने की घोषणा की है जिसके तहत 7 करोड़ रुपए वितरित किए जा चुके हैं। पिछले साल भी गुजरात सरकार ने उन किसानों को 900 रुपए प्रति महीना की सहायता राशि प्रदान की थी जिन्होंने गाय-आधारित प्राकृतिक खेती को अपनाया।

केंद्र सरकार परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जीरो बजट प्राकृतिक खेती नामक एक सब-स्कीम चला रही है जिसका नाम भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP) है। इसके तहत प्राकृतिक खेती के लिए 12,200 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से मदद दी जा रही है। यह राशि किसानों को खेत को पूरी तरह से जैविक बनाने, उनके क्लस्टर निर्माण, क्षमता निर्माण के लिए दिया जाता है।

केंद्र के विज़न को आगे बढ़ाते हुए गुजरात सरकार भी प्राकृतिक कृषि के लिए बहुत काम कर रही है। राज्य के मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल स्वयं प्राकृतिक खेती के पेरौकार हैं। उनका कहना है “हमारी फूड चेन में यूरिया और पेस्टिसाइड जैसे ज़हरीले पदार्थ लोगों के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं लेकिन प्राकृतिक खेती से पैदा होने वाला शुद्ध एवं सात्विक खाना सबके लिए अच्छा होगा”।

गुजरात में इस बार होने वाले वैश्विक वाइब्रेंट सम्मेलन में भी कृषि क्षेत्र पर बल दिया जाएगा। इस समिट से पहले ही कृषि क्षेत्र के लिए निवेशकों ने 2359 करोड़ रुपए के समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। इसके लिए आमान्या ऑर्गेनिक ने 150 किलोलीटर रोजाना इथेनॉल उत्पादन प्लांट के लिए 192 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किया।

गांधीनगर में एग्री प्रोडयूस ग्रीन ई-कॉमर्स प्रोजेक्ट के लिए 200 करोड़, डीएपीएस इन्फ्रा का 150 किलोलीटर क्षमता के प्लांट के लिए 192 करोड़ के एमओयू आदि शामिल हैं।

प्राकृतिक खेती, कृषि का एक महत्वपूर्ण आयाम है जो 21वीं सदी की भारतीय कृषि का कायाकल्प करने में मददगार साबित होगा।

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