पिछले चार दशकों में अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी गिरावट, वजह केवल कोरोना नहीं

पिछले चार दशकों में अर्थव्यवस्था में यह जो सबसे बड़ी गिरावट आई है, उसकी वजह केवल कोरोना नहीं है। इसकी वजह सरकार की नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम हैं। इस गिरावट के प्रमुख कारण भले ही कोविड-19 को माना जा रहा है, लेकिन 2016 की नोटबंदी और फिर 2017 से बहुत ऊंची कर दरों के साथ जीएसटी लागू होना इसके पीछे के बड़े कारण हैं।

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पिछले चार दशकों में अर्थव्यवस्था में यह जो सबसे बड़ी गिरावट आई है, उसकी वजह केवल कोरोना नहीं है। इसकी वजह सरकार की नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम हैं। इस गिरावट के प्रमुख कारण भले ही कोविड-19 को माना जा रहा है, लेकिन 2016 की नोटबंदी और फिर 2017 से बहुत ऊंची कर दरों के साथ जीएसटी लागू होना इसके पीछे के बड़े कारण हैं।

-डा. लखन चौधरी 

वित्तवर्ष 2020-21 पिछले चार दशकों में अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी गिरावट का साल रहा है। केन्द्रीय सांख्यिकी और क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार 2020-21 में देश  की जीडीपी यानि सकल घरेलु उत्पाद की वृद्धि दर यानि ग्रोथ रेट में 7.3 फीसदी कमी आने के संकेत हैं।

इसका तात्पर्य है कि 2020-21 में देश की जीडीपी ऋणात्मक रही है, और यह 1979-80 की गिरावट -5.2 फीसदी से भी अधिक -7.3 फीसदी है। 1979-80 में जीडीपी में गिरावट का बड़ा कारण देशभर में सूखा एवं पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी को बताया जाता है।

2020-21 का बड़ा कारण कोरोना महामारी के कारण लबी अवधियों तक लाकडाउन है। पिछले 40 सालों में अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी गिरावट के प्रमुख कारण भले ही कोरोना तालाबंदी है, लेकिन अर्थव्यवस्था में गिरावट की शुरूआत 2017-18 से ही आने लग गये थे।

2019- 20 में जीडीपी ग्रोथ रेट 4.2 फीसदी थी। यह 11 साल में सबसे कम ग्रोथ रही थी। इससे पहले 2018-19 में यह 6.12 फीसदी, 2017-18 में 7.04 फीसदी और 2016-17 में यह 8.26 फीसदी रही थी। जीडीपी में गिरावट के कारण देश में प्रति व्यक्ति आय में गिरावट दर्ज की गई है।

2019-20 की तुलना में 2020-21 में प्रति व्यक्ति आय में 8.24 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। 2019-20 में देश के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय 1,08,645 रूपये थी जो 2020-21 में 8,951 रूपये गिर कर 99,694 रूपये रह गई है। इसका मतलब यह है कि अब देश के नागरिकों की क्रय शक्ति आने वाले सालों में और घट जायेगी, जिससे बाजार की मांग पर इसका ऋणात्मक असर पड़ेगा।

तात्पर्य यह है कि वर्तमान वित्त वर्ष 2021-22 में भी जीडीपी में गिरावट का यह दौर जारी रह सकता है। इस गिरावट के प्रमुख कारण भले ही कोविड-19 को माना जा रहा है, लेकिन 2016 की नोटबंदी और फिर 2017 से बहुत ऊंची कर दरों के साथ जीएसटी लागू होना इसके पीछे के बड़े कारण हैं।

2020-21 की पहली दो तिमाहियों में मंदी (-24.4 और -7.4 प्रतिशत) दर्ज की गई। इसी तरह, तीसरी और  चौथी  तिमाही में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ। इसके बावजूद सरकार की तरफ से अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कोई ठोस काम नहीं किया गया।

केवल कागजी राहत पैकेजों की घोषणा एवं जुमलेबाजी में आर्थिक सुधार की बातें होती रहीं जिसका नतीजा यह रहा कि 2020-21 में अर्थव्यवस्था में -7.3 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। जबकि इसी अवधि में बांग्लादेश  में जीडीपी की वृद्धि दर 9 फीसदी से अधिक दर्ज हुई है।

अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए देश एवं भारतीय मूल के बड़े अर्थशास्त्रियों द्वारा अनेक सकारात्मक सलाह एवं सुझाव दिये गये लेकिन सरकार ने किसी की एक नहीं सुनी जिसका परिणाम सबके सामने है।

अर्थव्यवस्था के प्रोत्साहन के लिए सरकारी खर्चों में वृद्धि, नई नियुक्तियां, गरीबों को सीधा नकद हस्तांतरण, मनरेगा में फंडिंग बढ़ाने, मुफ्त राशन का उदार वितरण जैसे अनेक सुझाव शामिल हैं, लेकिन सरकार ने सभी अच्छी सलाह को खारिज कर दिया।

सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों के वैश्विक अनुभवों की उपेक्षा की गई। राजकोषीय विस्तार और नकद हस्तांतरण के सुझावों को सरकार ने ठुकरा दिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे खोखले नारों के बदौलत सुधार की बात की गई।

निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है कि आर्थिक सुधार एवं अर्थव्यवस्था के मामले पर लगातार मात खाने या चूक होने के पीछे सरकार की अदूरदर्षितापूर्णं और अपरिपक्वतापूर्णं नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम जिम्मेदार हैं।

आने वाले समय में सरकार यदि अपनी आर्थिक सोच, विचारधारा एवं नीतियों में तार्किक एवं व्यावहारिक बदलाव एवं सुधार नहीं करती है तो यकीन मानिए अर्थव्यवस्था में और बड़े झटके आयेंगे, जिसकी भरपाई अंततः देश के नागरिकों को ही करनी पड़ेगी।

याद रहे, पिछले चार दशकों में अर्थव्यवस्था में यह जो सबसे बड़ी गिरावट आई है, उसकी वजह केवल कोरोना नहीं है। इसकी वजह सरकार की नीतियां, योजनाएं एवं कार्यक्रम हैं।

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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