मिली तो नहीं है मगर ढूँढता हूँ, ख़ुशी मैं तुझे दर-बदर ढूँढता हूँ

मिली तो नहीं है मगर ढूँढता हूँ, ख़ुशी मैं तुझे दर-बदर ढूँढता हूँ… उक्त पंक्तियाँ सुपरिचित कवि अशोक शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत कीं. पिथौरा राजमहल सभागार में आयोजित इस गोष्ठी में महासमुंद, बागबाहरा, बसना एवं श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के रचनाकारों ने काव्य पाठ किया.

पिथौरा|  मिली तो नहीं है मगर ढूँढता हूँ, ख़ुशी मैं तुझे दर-बदर ढूँढता हूँ… उक्त पंक्तियाँ सुपरिचित कवि अशोक शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर श्रृंखला साहित्य मंच द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत कीं. पिथौरा राजमहल सभागार में आयोजित इस गोष्ठी में महासमुंद, बागबाहरा, बसना एवं श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के रचनाकारों ने काव्य पाठ किया.

कार्यक्रम का शुभारंभ माता सरस्वती एवं मुंशी प्रेमचंद के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ. इस अवसर पर स्वागत भाषण में श्रृंखला के पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित ने मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन परिचय के साथ उनके साहित्यिक अवदान पर विस्तृत उद्बोधन दिया. श्री दीक्षित ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद जिन आदर्शों पर लिखा करते थे उन आदर्शों को अपने जीवन में भी उतारते थे.

इसके पश्चात कवि गोष्ठी में महासमुंद, बागबाहरा, बसना एवं श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा के रचनाकारों ने काव्य पाठ किया. सभी रचनाकारों ने अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के साथ अपने अपने क्षेत्र की साहित्यिक परंपरा का परिचय दिया. कार्यक्रम की अध्यक्षता महासमुंद से पधारे राष्ट्रीय स्तर पर सुपरिचित कवि अशोक शर्मा कर  रहे थे. उन्होंने ने अपनी ख्याति के अनुरूप श्रेष्ठ रचनाएं सुनाईं जिनका श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया. बानगी देखिए –

“मिली तो नहीं है मगर ढूँढता हूँ,

ख़ुशी मैं तुझे दर-बदर ढूँढता हूँ.

चलो ख़ूब यायावरी हो गई अब,

कहाँ छोड़ आया हूँ घर ढूँढता हूँ.”

श्रृंखला सहित मंच के अध्यक्ष और सुपरिचित कवि गीतकार प्रवीण ‘प्रवाह’ ने अपने गीत और ग़ज़ल से खूबसूरत समां बांधा उनकी इन पंक्तियों ने खूब तालियाँ बटोरीं –

“फिसलते रहे हम संभालते संभालते

संभल ही गए हम फिसलते फिसलते

उठा कर हमारा उठा ही रहेगा

तुम्हीं थक न जाना कुचलते कुचलते”

बागबाहरा से पधारे कवि रुपेश तिवारी ने अपनी छत्तीसगढ़ी रचनाओं से पारंपरिक शब्दों की सुंदरता से श्रोताओं को परिचित कराया। उनकी ये पंक्तियाँ देखिए –

“सगा पंहुना घर घुंदिया, खेले भौंरा बांटी.

खुडवा फूगड़ी गेंड़ी दौड़े,कूदे उलान बांटी.

लुकाछिपी बिल्लस के, दांव कहाँ हे,

शहरिया चकाचौंध में तोर गाँव कहाँ ह.”

सेवानिवृत प्राचार्य और सुपरिचित कवि अनूप दीक्षित ने अपनी अपनी कविता के माध्यम से सामाजिक विद्रुपता पर प्रहार किया. उनकी ये पंक्तियां देखिए – शादी से पहले “प्री वेडिंग “का यह कैसा परिणाम/’सिया’ ने ‘चेतन’ से मिलकर, ली ‘केतन’ की जान/ खौफनाक इस वारदात से,लोग हुए स्तब्ध/  यह कोई साजिश थी,या कोई प्रारब्ध.

महासमुंद से पधारे कवि बंधु राजेश्वर राव खरे ने कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी को समर्पित करते हुए “दार बोहागे चारों कोना”शीर्षक से छत्तीसगढ़ी कहानी के माध्यम से मुंशी प्रेम चंद की परंपरा का निर्वहन करते हुए दलितों के शोषणचक्र पर अपनी पैनी कलम से प्रहार किया.

बसना के कवि रमेश सोनी अपनी नई कविता की भाव प्रवणता से श्रोताओं को प्रभावित करने में सफल रहे। उनकी ये पंक्तियाँ देखिए -“अपने फायदे के लिए जबसे/ पानी बोतलों में बिकने लगा/ मछलियाँ भटक रही हैं आसरे के लिए / पानी,मछली और औरतों को बाज़ार किसी वहशी की तरह देखता है.

बागबहरा के अजीज शायर हसीब समर ने तरन्नुम में ग़ज़लें सुनाकर श्रोताओं का दिल जीत लिया। उनकी इन पंक्तियों ने खूब दाद हासिल कीं –

हीरे मोती करे क्या वो लेकर, भूख से पेट जिसका हो खाली,

घर मिले सूखी रोटी का टुकड़ा,उसकी फिर रोज ईद और दिवाली.

श्रृंखला साहित्य मंच के वरिष्ठ रचनाकार एस के डड़सेना जी ने सधी लेखनी से वेटियों की महत्ता पर एक स्नेहिल रचना सुनाई। उनकी ये पंक्तियाँ सराहनीय थीं –

ईश्वर का अनुपम उपहार है बेटियाँ,स्नेहल संवेदनाओं का भंडार है बेटियाँ.

मानते है हम बेटों को स्वर्ण अगर,बहुमूल्य हीरों का श्रृंगार है बेटियाँ.

पत्रकार कवि संतोष गुप्ता ने भी कथा लेखन की परम्परा में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हुए अपनी एक उम्दा लघु कथा और कविता से श्रोताओं का दिल जीता। उनकी पंक्तियां देखिए –

तू , मैं , मैं , तू आओ छोड़ दें ,

हम , सब , सब , हम.

मैं , तू हटा के हम जोड़ दें.

आओ हम अहं छोड़ दें .

श्रृंखला की होनहार कवियत्री गुरुप्रीत कौर की नई शैली की रचनाओं ने श्रोताओं को अत्यंत प्रभावित किया.‌ उनकी इन पंक्तियों पर खूब वाहवाही हुई –

“पुरानी कितनी है सभ्यता,  यही जता पाते हो न,

वर्तमान कैसा असभ्य हो रहा,  नहीं बता पाते हो न.”

श्रृंखला साहित्य मंच के उपाध्यक्ष एवं  अपनी क्षणिकाओं के लिए सुपरिचित कवि कैलाश बंसल ने अपनी विशेष छाप छोड़ी उनकी इन पंक्तियों पर खूब वाहवाही हुई –

“कुछ डॉक्टर मरीज को इस तरह सताते हैं,

साल भर चूना लगाकर कैल्शियम की कमी बताते हैं.”

पिथौरा की कवियत्री जीतेश्वरी साहू ने

नारी अस्मिता पर रचना सुना कर अलग छाप छोड़ी। उनकी श्रेष्ठ पंक्तियाँ देखिए –

“किस बात का विकास है ये किस काम की

विकसित नहीं है कलियाँ तेरे बागबान में.

तुम जा के आओ बेश़क चाॅंद तारों पर

मालूम भी हो क्या है अपने गिरहबान में.”

पिथौरा के कवि माधव तिवारी ने मुंशी प्रेमचन्द की कृतियों पर अपनी छत्तीसगढ़ी रचना से खूब तालियाँ बटोरीं.

बानगी देखिए –

‘पंच परमेश्वर ‘ के वो नियाव, आजो अदालत ला सिखाते,

‘नमक का दरोगा’ बन के बंशीधर,ईमान के रस्ता देखाथे.”

युवा कवि संजय गोयल की क्षणिकाएँ काफी चुटीली थीं. बानगी देखिए –

विरोध कीजिए आवाज उठाईए, अपना अधिकार मांगते रहिए,

पर अपनी भाषा में संस्कार और व्यवहार में सम्मान रखिए.

ग्राम सरकड़ा के कवि उत्तरा सिन्हा ने भी अपनी कविताओं के सस्वर पाठ से प्रभावित किया. कार्यक्रम का संचालन श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण ‘प्रवाह’ ने किया. आभार प्रदर्शन अनूप दीक्षित ने किया.

Pithoraछत्तीसगढ़श्रृंखला साहित्य मंच
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