विधानसभा चुनाव में ईडी, रेड, सट्टा, भष्ट्राचार जैसे मुद्दों की भूमिका ?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम पर है. इस बीच सियासी माहौल में महादेव सट्टा ऐप की चर्चा इन दिनों सुर्खियों पर है. इस सट्टा ऐप ने छत्तीसगढ़ की सियासी घमासान को राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी विमर्श के केन्द्र में खड़ा कर दिया है. 

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम पर है. इस बीच सियासी माहौल में महादेव सट्टा ऐप की चर्चा इन दिनों सुर्खियों पर है. इस सट्टा ऐप ने छत्तीसगढ़ की सियासी घमासान को राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी विमर्श के केन्द्र में खड़ा कर दिया है.  इसी सट्टा ऐप के संचालकों में से एक की शादी समारोह में सिरकत को लेकर वालीवुड के कई नामी-गिरामी चेहरों तक को ईडी का समन जारी हो चुका है. भाजपा तो खुलकर कांग्रेस पर आरोप लगा रही है कि इसके जाल में प्रदेश कांग्रेस और उसके नेतृत्वकर्ता बुरी तरह फंसी हुई है. इसमें कथित संलिप्तता को लेकर छत्तीसगढ़ में कई लोग गिरफ्तार किये जा चुके हैं, लेकिन अभी तक इसकी हकीकत क्या है ? और इसमें कुछ हकीकत है भी या नहीं ? किसी को समझ नहीं आ रहा है.

मगर दिलचस्प यह है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में सट्टा ऐप की चर्चाएं गांव-गांव तक जा पहुची हैं. लोग कहने लगे हैं कि क्या वाकई सट्टा ऐप के आरोपों में दम है ? क्या यह मुद्दा इस बार 2023 के विधानसभा चुनाव की दशा-दिशा को बदलने में कोई असर डाल सकता है ? क्या इससे भाजपा को कोई चुनावी फायदा हो सकता है ? सट्टा ऐप संचालकों के आरोप के हिसाब से क्या भाजपा राज्य में सरकार बनाने की मुहिम तक पहुंच सकती है ? क्या इस आरोप के बलबुते भाजपा की सीटें 13-15 से बढ़कर 30-35-40 तक जा सकती हैं ? कई तरह के सवाल हैं, जिनको लेकर इन दिनों छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में मजेदार कानाफुसी हो रही है.

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छत्तीसगढ़ की सियासत में जिस तरह से महादेव सट्टा ऐप के संचालकों की बयानबाजी जनमानस के बीच जोर पकड़ रही है, यदि भष्ट्राचार के इस कथित मुद्दे को जनता कहीं गंभीरता से पकड़ लेती है तो कांग्रेस की मुसीबत बढ़ सकती है. भष्ट्राचार के कई कथित कई आरोपों के बीच कांग्रेस जिस तरह से भाजपा के साथ मुकाबला कर रही है, यह दिलचस्प है. लेकिन महादेव सट्टा ऐप के संचालकों द्वारा भूपेश बघेल को कथित तौर पर 508 करोड़ रू. देने के भुगतान की बात या आरोप में कितना दम है ? यह कहना बेहद कठिन है. क्या यह मसला राज्य की चुनावी बिसात की फ़िजा बदल सकती है ? सवाल उठता है कि क्या भूपेश बघेल पर लगे आरोप में वाकई दम है ? क्या वाकई में कांग्रेस सट्टा-हवाला के पैसों से चुनाव लड़ रही है ? जैसा कि भाजपा के वरिष्ठ नेतागण आरोप लगा रहे हैं.

बड़ा सवाल, जो हजम नहीं हो रहा है कि क्या भूपेश बघेल इतने अपरिपक्व खिलाड़ी हैं जो महादेव सट्टा ऐप संचालकों से सीधे तौर पर पैसा ले सकते हैं ? क्या ऐप के संचालक या मालिक इसके पक्के सबूत ईडी को दे सकते हैं ? यदि ईडी के पास ठोस सबूत है तो फिर ईडी इसे जांच का विषय क्यों बता रही है ? क्या ईडी की जांच से सियासत प्रभावित होगी ? क्या ईडी की कार्रवाई छत्तीसगढ़ के आम जनमानस की राजनीतिक सोच में बदलाव ला सकती है ? क्या ईडी के ताबड़तोड़ कार्रवाईयों से विधानसभा चुनाव के नतीजे वाकई बदल सकते हैं ?

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों भारी उठापटक और अफरा-तफरी का माहौल है. गांवों से लेकर शहरों तक मतदाताओं के रूझानों को समझना, पढ़ना और सटीक न सही; कोई ठीक-ठाक ही आंकलन करना बेहद टेढ़ीखीर लगती है।

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इधर केन्द्र सरकार ने ईडी यानि प्रवर्तन निदेशालय के अनुरोध पर महादेव बेटिंग सट्टा ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया है. सवाल यह भी उठता है कि 28 फीसदी जीएसटी की आड़ में इस तरह के कारोबारों को अनुमती देना कितना उचित है ? सरकार इस तरह के कार्यों को अनुमति ही क्यों देती है ? इस तरह के धंधों पर प्रतिबंध लगाने में इतनी देरी क्यों की जाती है ? इनके संचालक बेखौफ किस तरह दुनिया के दूसरे देशों से कारोबार चलाते हैं ? और सरकारें इनका बाल भी बांका क्यों नहीं कर पाते हैं ? इनके संचालकों को सरकार गिरफ्तार करके तत्काल भारत क्यों नहीं लाती है ? या इनको भारत लाने में देरी क्यों की जाती है ? क्या यह जानबूझकर की जाती है ? या सियासी लाभ के लिए यह किया जाता है ?

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इस सट्टा ऐप के कुछेक संचालकों की भाजपा नेताओं के साथ साठगांठ की भी खबरें हैं. कई जानकारों का कहना है कि इससे भाजपा को फायदा के बजाय नुकसान भी हो सकता है, क्योंकि भूपेश बघेल ने इसे अपनी छवि खराब के मुद्दे से जोड़कर तत्काल कार्रवाई की मांग की है. हिन्दूत्ववादी संगठनों से जुड़े कई लोगों का मानना है कि उनके आराध्य महादेव से जोड़कर जिस तरह से गोरखधंधें का खेल चल रहा है, इसके बावजूद केन्द्र सरकार इनके संचालकों पर कार्रवाई करने में विलंब क्यों कर रही है ? भाजपा सहित बहुत से सियासी जानकारों का मत है कि पिछली बार इसी तरह भूपेश बघेल को घेरने के लिए सीडी कांड जैसे मुद्दे को तूल दिया गया था, लेकिन उसका हश्र क्या हुआ ? कहीं इस बार भी मामला उल्टा न पड़ जाए ? लिहाजा राज्य के नेता इस मसले पर कम ही बोलते दिखते हैं।

छत्तीसगढ़ में भाजपा कुछ आश्वसत दिखती है कि विधानसभा चुनाव में ईडी, रेड, सट्टा, भष्ट्राचार जैसे मुद्दे उसके पक्ष में जरूर सकारात्मक वातावरण बनाकर जनमत को प्रभावित करेंगे. वहीं कांग्रेस और भूपेश बघेल कर्जा माफी, धान खरीदी जैसे खेति-किसानी से जुड़े कामों के दम पर एक बार फिर चुनावी वैतरणी पार करने के फिराक में दिखते हैं.

बहरहाल, यह देखना बेहद दिलचस्प हो सकता है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में राज्य के मतदाता किस पर भरोसा करते हैं ? या किसकी गारंटी पर अपना मोहर लगाते हैं ? लेकिन यह तय है कि राज्य में कम से कम विधानसभा चुनाव में ईडी, रेड, सट्टा, भष्ट्राचार जैसे मुद्दे बड़ी भूमिका में रहेंगे ? ऐसे आसार कम ही लगते एवं दिखते हैं। कहा जाए कि छत्तीसगढ़ में इन मुद्दों पर भाजपा यानि विपक्ष द्वारा चुनाव लड़ा जरूर जा रहा है, लेकिन विधानसभा चुनाव में इनकी बड़ी निर्णायक भूमिका रहेगी ? जिससे सत्ता और सियासत पलट सकती है; फिलहाल ऐसा लगता नहीं है।

-डॉ. लखन चौधरी

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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