छत्तीसगढ़: पेंशन तक को मोहताज ये रिटायर शिक्षक
आज उनके पढ़ाये कई छात्र विधायक जैसे जनप्रतिनिधि,जज,प्रोफेसर, डॉक्टर,इंजीनियर,जैसे उच्च प्रशासनिक पदों रहकर मोटी तनखा, मोटा पेंशन, समेत मोटी-मोटी सुविधाएँ हासिल कर रहे हैं,पर जिन गुरुओं ने अपनी विद्वता से इन सबको इस काबिल बनाया,वे खुद रिटायर होने के बाद ग्रेच्युटी तो दूर,पेंशन तक को मोहताज हैं.
आज उनके पढ़ाये कई छात्र विधायक जैसे जनप्रतिनिधि,जज,प्रोफेसर, डॉक्टर,इंजीनियर,जैसे उच्च प्रशासनिक पदों रहकर मोटी तनखा, मोटा पेंशन, समेत मोटी-मोटी सुविधाएँ हासिल कर रहे हैं, पर जिन गुरुओं ने अपनी विद्वता से इन सबको इस काबिल बनाया, वे खुद रिटायर होने के बाद ग्रेच्युटी तो दूर,पेंशन तक को मोहताज हैं. यह हाल है छत्तीसगढ़ के शत-प्रतिशत शासकीय अनुदान प्राप्त अशासकीय स्कूलों के सेवानिवृत्त शिक्षकों का. एक रिटायर्ड शिक्षक की मानें तो प्रदेश में ऐसे रिटायर्ड शिक्षक हजार-बारह सौ से ज्यादा नहीं हैं. विडंबना की बात यह भी है कि उन्हीं के समकक्ष सरकारी स्कूलों के शिक्षक और कर्मचारी रिटायर होने के बाद नियमित पेंशन हासिल करते हैं, उन्हें ग्रेच्युटी भी मिलती है.
-प्रवीण प्रवाह
छत्तीसगढ़ में अनेक ऐसे स्कूल हैं, जो सरकारी तो नहीं हैं, लेकिन उनके संचालन के लिए सरकार से वेतन -भत्तों के रूप में शत -प्रतिशत अनुदान मिलता है.इन स्कूलों का संचालन स्थानीय समितियों द्वारा किया जाता है.ये स्कूल अशासकीय होने के बाद भी सरकारी नियमों के तहत बिल्कुल वैसे ही संचालित हैं, जैसे अन्य सरकारी स्कूल. इन स्कूलों में पढ़ाई भी सरकारी पाठ्यक्रमों के अनुसार होती है.
शासकीय अनुदान प्राप्त इन अशासकीय स्कूलों के शिक्षकों को अध्यापन कार्य के अलावा समय-समय पर कई तरह के सरकारी काम भी सौंपे जाते हैं. जैसे जनगणना, मतदान और मतगणना में भी इनकी ड्यूटी लगाई जाती है. बोर्ड परीक्षाओं में भी सरकारी शिक्षकों के समान इन्हें दायित्व सौंपा जाता है.
सरकारी अनुदान से वहाँ के शिक्षकों और कर्मचारियों को वेतन तो मिलता है, लेकिन कई दशकों तक सैकड़ों, हजारों बच्चों को पढ़ाकर जब वे रिटायर होते हैं तो उन्हें खाली हाथ अपने घर जाना होता है. सरकारी नियम भी इस तरह कि वर्ष 2013 के पहले जो रिटायर हुए हैं, उन्हें पेंशन और ग्रेच्युटी नहीं मिल रही है, जबकि वर्ष 2013 के बाद रिटायर हुए शिक्षकों को सिर्फ़ ग्रेच्युटी मिल रही है, लेकिन वे भी मासिक पेंशन से आज तक वंचित हैं.
बता दें के उन्हीं के समकक्ष सरकारी स्कूलों के शिक्षक और कर्मचारी रिटायर होने के बाद नियमित रूप से हर महीने पेंशन प्राप्त करते हैं, उन्हें ग्रेच्युटी की राशि भी मिल जाती है.

श्री कैलाश शंकर प्रधान 86 साल के हो चुके हैं. वे महासमुन्द जिले के ग्राम पाटसेंदरी (विकासखंड-सरायपाली) स्थित कृषक उच्चतर माध्यमिक स्कूल के सेवनिवृत्त प्राचार्य हैं. वे भी रिटायरमेंट के बाद पेंशन और ग्रेच्युटी से वंचित हैं. श्री कैलाश शंकर प्रधान शासकीय अनुदान प्राप्त स्कूलों के सेवानिवृत्त शिक्षक तथा कर्मचारी मंच फुलझर इकाई (सरायपाली -बसना )के अध्यक्ष भी हैं.
उन्होंने बताया कि “ पेंशन और ग्रेच्युटी के इंतजार में अनेक सेवानिवृत्त शिक्षक दुनिया छोड़ कर जा चुके हैं. फिर भी हम लोगों ने उम्मीद का दामन थाम रखा है,कि कभी तो सरकार का ध्यान हम बुजुर्ग शिक्षकों की इस गंभीर समस्या ओर जाएगा. वे कहते हैं, “हमने शिक्षकीय कार्य के जरिए सैकड़ों -हजारों बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए सारा जीवन अर्पित कर दिया, लेकिन रिटायर होने के लम्बे अरसे के बाद आज भी हम पेंशन के बिना एक उपेक्षित जीवन जी रहे हैं. ग्रेच्युटी की तो बात ही छोड़िए. क्या यह एक अमानवीय स्थिति नहीं है?”
श्री कैलाश शंकर प्रधान का कहना है कि छत्तीसगढ़ में ऐसे शिक्षक बहुत अधिक नहीं है, उनकी अनुमानित संख्या हजार -बारह सौ से ज्यादा नहीं होगी. उन्हें पेंशन और ग्रेच्युटी का भुगतान करने में सरकार पर कोई विशेष वित्तीय भार नहीं आएगा. शासन के कुछ करोड़ रूपए ही खर्च होंगे, लेकिन इन सेवानिवृत्त शिक्षकों के जीवन का अंतिम समय संतोषजनक रूप से व्यतीत हो सकता है. ये शिक्षक 62 वर्ष की आयु पूर्ण होते ही खाली हाथ रिटायर हो गए.

महासमुंद जिले के ग्राम -नयापारा (खुर्द ) स्थित शत् प्रतिशत शासकीय अनुदान प्राप्त शाला विद्या मंदिर के 90 वर्षीय सेवानिवृत्त प्रधान अध्यापक श्री कृष्ण चंद्र प्रधान भी पेंशन और ग्रेच्युटी से वंचित हैं. वे सन 1998 में रिटायर हुए. उन्होंने अपनी मेहनत से स्कूल को संवारा, सैकड़ों बच्चों का भविष्य बनाया. उन्होंने बताया,” सन 1959 में जब वे विद्या मंदिर नयापारा में पदस्थ हुए, तब उस विद्यालय में केवल 15 छात्र थे, अज्ञानता और पिछड़ेपन के चलते लोग अपने बच्चों को स्कूल में नहीं भेजते थे. ऐसी परिस्थिति में श्री प्रधान रोज सुबह सायकल से 25 किलोमीटर जाते थे और ग्रामीणों से सम्पर्क करके उन्हें बच्चों को शाला भेजने के लिए प्रेरित करते थे.”

जंगल और खेतों में भटकते बच्चे श्री प्रधान की प्रेरणा से उत्साहपूर्वक स्कूल आने लगे और स्कूल में दर्ज संख्या 100 से भी अधिक हो गई. श्री कृष्णचंद्र प्रधान के पढ़ाए अनेक बच्चे आज प्रोफेसर, डॉक्टर, प्राचार्य, लेक्चरर और अन्य अनेक प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए अपने स्कूल, अपने गाँव और परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं.
श्री कृष्णचंद्र प्रधान बताते हैं,” विद्या मंदिर कोई साधारण अनुदान प्राप्त स्कूल नहीं है. यह राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा के अनुरूप शासन के विद्या मंदिर एक्ट 1939 के तहत प्रारंभ की गई शाला है. फिर भी इस शाला के शिक्षकों को पेंशन और ग्रेच्युटी से वंचित रखा गया है. यह अत्यंत निराशाजनक स्थिति है.”
फुलझर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भगत देवरी के ही सेवानिवृत्त व्याख्याता श्री विनोद पुरोहित जो रिटायर होने के बाद पैरों में पैरालिसिस से पीड़ित हैं. उन्होंने कहा, “हमारे पढ़ाए बच्चे आज बड़े शासकीय पदों एवं राजनीति में भी विभिन्न पदों पर आसीन हैं. “

शासकीय अनुदान प्राप्त फुलझर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भगत देवरी ( विकास खंड- पिथौरा) के सेवानिवृत्त व्याख्याता श्री हेमन्त पात्र, जो शासकीय अनुदान प्राप्त विद्यालय सेवानिवृत्त शिक्षक/ कर्मचारी मंच के सचिब हैं, बताते हैं “ जीवन भर शासन की सेवा करने के बाद हमें उम्मीद थी कि शासन हमारे प्रति सहानुभूति अवश्य दिखाएगा. लेकिन सिर्फ़ निराशा हाथ लगी है. बुढ़ापे में खाली हाथों को मलने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है.

शासकीय अनुदान प्राप्त कृषक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पाटसेंद्री के सेवानिवृत्त प्राचार्य कृपाराम पटेल ( “उपाध्यक्ष, शासकीय अनुदान प्राप्त विद्यालय सेवानिवृत शिक्षक/ कर्मचारी मंच”) कहते हैं, “उनके पढ़ाए छात्र विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष और न्यायाधीश जैसे प्रतिष्ठित पदों पर भी पहुंच चुके हैं, लेकिन हमारी सेवाओं का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है.
छत्तीसगढ़ के सरकारी अनुदान प्राप्त अनेक अशासकीय स्कूलों की तरह महासमुंद जिले में अनेक अनुदान प्राप्त विद्यालय हैं जो अपनी उत्कृष्ट शिक्षा और श्रेष्ठ परीक्षाफलों के द्वारा देश और समाज को अपना योगदान दे रहे हैं. इन विद्यालयों के ये विद्वान और योग्य शिक्षक बुढ़ापे में ग्रेच्युटी और पेंशन नहीं मिलने के कारण उपेक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर हैं. आज इन गुरुओं की वाणी में विद्वता का तेज तो है लेकिन आँखों में घन घोर निराशा है.
पता नहीं कब शासन-प्रशासन इनका सुध लेगा? पता नहीं कब इनके पढ़ाये काबिल राजनीतिक नेताओं, अफसरों की नजरें पड़ेंगी और इनके बचे खुचे जीवन में एक उजाला आयेगा.
(प्रवीण ‘प्रवाह’ एक पुरस्कृत कवि / चित्रकार हैं जो छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के पिथौरा में पले-बढ़े हैं.वे हिंदी, उड़िया और छत्तीसगढ़ी में लिखते हैं. उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘भूलन द मेज’ का शीर्षक गीत लिखा है. उन्होंने ग़ज़लें और भजन भी लिखे हैं जिन्हें प्रसिद्ध कलाकारों ने गाया है. वे ‘श्रृंखला साहित्य मंच, पिथौरा’ के अध्यक्ष हैं, जिसकी स्थापना उन्होंने तीन दशक पहले की थी.)
