नाम बदलने के “खेला” के बीच इंदिरा की याद और कांग्रेस की मौजूदा हालत

कंगना वाली कथित आजादी के दौर से नाम बदलने का "खेला" जोरों पर जारी है। दिल्ली की सरकार बहादुर और उसके लोग डंके की चोट पर नाम बदलने का "खेला" चला रहे हैं।

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मो. जाकिर हुसैन 
कंगना वाली कथित आजादी के दौर से नाम बदलने का “खेला” जोरों पर जारी है। दिल्ली की सरकार बहादुर और उसके लोग डंके की चोट पर नाम बदलने का “खेला” चला रहे हैं।
वहीं कॉन्ग्रेस इस मामले में कच्ची खिलाड़ी साबित हो रही है। ताजा मामला भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का ही ले लीजिए।
भारतीय जनता पार्टी को अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि रानी कमलापति दरअसल इस्लाम कुबूल कर चुके गोंड़ राजा निजाम शाह की सातवीं पत्नी थी और परंपरा के मुताबिक गोंड आदिवासी अपने आप को हिंदू नहीं मानते।
कम लोगों को मालूम है कि आज भी गोंड आदिवासी समुदाय के नियम कानून कायदों को पूरा सरकारी संरक्षण है और उसी के मुताबिक सरकारी फैसले लिए जाते हैं हिंदू समुदाय से जुड़े अधिनियम इन पर लागू नहीं होते।
फिर भी ऐलानिया तौर पर “अंतिम हिंदू रानी” का प्रचार करते हुए बीजेपी ने अपने वोट बैंक का तुष्टिकरण कर ही लिया है।
खैर, कांग्रेस की हालत तो अब ऐसी हो गई है कि वह चाह कर भी नाम बदलने के अपने सरकारी फैसले तक को लागू नहीं करवा पा रही है।
अपने छत्तीसगढ़ का ही उदाहरण ले लीजिए। यहां की निर्वाचित सरकार ने यहां के एकमात्र पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलकर भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के बजाय दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में रहकर पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार और कांग्रेस सांसद रहे स्वर्गीय चंदूलाल चंद्राकर के नाम पर करने का फैसला लिया था।
लेकिन भूपेश मंत्रिमंडल अपना ही फैसला लागू करवा पाने में असमर्थ है। फाइल राज्यपाल के पास अटकी है और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल नहीं चाहती कि नाम बदला जाए।
वैसे भी जिस वक्त विश्वविद्यालय का नाम बदलने की बात आई थी तब सुनियोजित ढंग से बहुत से लोगों ने इसके विरोध में मुहिम चलाई। अब हालत यह है कि सोशल मीडिया पर ऐसी मुहिम चलाने वाले ही राज्य सरकार की “आंख के तारा” बने हुए हैं और समितियों में शान के साथ बैठकर मलाई खा रहे हैं।
कॉन्ग्रेस की एक मजबूत/मजबूर सरकार की एक निशानी यह है?
उम्मीद कीजिए कि विधानसभा चुनाव से पहले अपने “फैजलवा” का खून खौलेगा और अपने आसपास मलाई खा रहे “रामाधीर” के लोगों की सफाई करते हुए फैसला लागू करवा पाएगा।
वैसे आज आयरन लेडी और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को याद करने का दिन है।
भिलाई में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार मो. जाकिर हुसैन सोशल मिडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं| वोल्गा से शिवनाथ तक उनकी चर्चित किताब है| यह पोस्ट फेसबुक से | इंदिरा गाँधी पर अपनी यादें इस तरह ताजा की-

इस सिलसिले में बता दूं कि इस्पात नगरी भिलाई में 50 साल पहले विधिवत केंद्र और राज्य सरकार की अनुमति के बाद सिविक सेंटर क्षेत्र का नाम बदलकर इंदिरा प्लेस किया गया था।

सिविक सेंटर को इंदिरा प्लेस करने की दास्तान भी बेहद रोचक है। दरअसल भारत चीन-युद्ध के दौरान जब अपने जांबाज जवानों के लिए देशवासियों का जज्बा उमड़ पड़ा था, तब भिलाई स्टील प्लांट के कर्मचारियों ने स्वेच्छा से लगातार छह माह तक अपनी तनख्वाह से एक निश्चित राशि कटवा कर राष्ट्रीय रक्षा कोष में भेजी थी।
इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी लोगों ने स्वेच्छा से राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए दान दिया था। यह राष्ट्रीय उस जमाने में डेढ़ लाख रुपए (आज शायद यह राशि डेढ़ करोड़ या उससे ज्यादा होनी चाहिए) थी और तब का भिलाई स्टील प्लांट मैनेजमेंट यह राशि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भिलाई बुलाकर उन्हें समर्पित करना चाहता था।
प्रधानमंत्री नेहरू ने भिलाई आने पर अपनी सहमति भी दे दी थी लेकिन आखिरी वक्त में किन्ही कारणवश नेहरू नहीं आ पाए।
उन्होंने प्रतिनिधि के तौर पर अपनी बेटी इंदिरा गांधी को 9 फरवरी 1963 को भिलाई भेजा था।
इंदिरा तब किसी पद पर नहीं थी सिर्फ राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य और नेहरु की बेटी के तौर पर इंदिरा भिलाई आई थी जहां उनका भव्य स्वागत हुआ और सिविक सेंटर के मैदान में उस वक्त के जनरल मैनेजर सुकू सेन व उनकी पत्नी ईला सेन ने डेढ़ लाख रुपए की यह राशि इंदिरा गांधी को सौंपी थी।
बाद के दौर में पाकिस्तान को धूल चटाने और बांग्लादेश निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका को देखते हुए भिलाई स्टील प्लांट मैनेजमेंट को देशवासियों की भावना के अनुरूप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सम्मानित करने का विचार आया।
तब तय यह हुआ था कि जिस जगह पर भिलाई वासियों ने राष्ट्रीय रक्षा कोष में इंदिरा गांधी को डेढ़ लाख रुपए 100 पर थे उस जगह का इंदिरा प्लेस के रूप में नामकरण किया जाए।
इस पर केंद्र सरकार राजी थी और राज्य सरकार भी। इस वजह से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भिलाई प्रवास हेतु अनुरोध किया गया। उन्होंने इसे स्वीकार भी किया और तय हुआ 25 जनवरी 1972 का दिन।
हालांकि अगले ही दिन गणतंत्र दिवस होने की वजह से दिल्ली में व्यस्तता के चलते आखिरी समय में इंदिरा गांधी का भिलाई दौरा टल गया था लेकिन तयशुदा दिन 25 जनवरी 1972 को एक समारोह में भिलाई स्टील प्लांट के तत्कालीन जनरल मैनेजर पृथ्वीराज आहूजा ने सिविक सेंटर का नामकरण इंदिरा प्लेस करते हुए इसे भिलाई वासियों को समर्पित किया था।
अब इस घटना को 50 साल होने जा रहे हैं। आज सरकारी रिकॉर्ड में सिविक सेंटर का नाम भले ही इंदिरा प्लेस हो लेकिन लोग अब भूल चुके हैं। जिस नाम पट्टिका का अनावरण यहां किया गया था। वह भी अब ट्रैफिक पार्क के बियाबान जंगल में खो चुकी है। जिसके चारों तरफ गंदगी पसरी हुई है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद इंदिरा गांधी के नाम की ऐसी दुर्दशा से कांग्रेसी भी अनजान है। क्या भारतीय जनता पार्टी जैसा आक्रमक विरोध करना कांग्रेस छोड़ चुकी है?
कॉन्ग्रेस क्या थी? क्या है? अब आगे पता नहीं कॉन्ग्रेस और क्या होगी ?
फोटो में जनरल मैनेजर सुकू सेन भिलाई वासियों की तरफ से राष्ट्रीय रक्षा कोष में डेढ़ लाख रुपए का चेक इंदिरा गांधी को देते हुए और दूसरी फोटो में जनरल मैनेजर पृथ्वीराज आहूजा इंदिरा प्लेस की पट्टिका का अनावरण करते हुए।
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