सहयोग और सहअस्तित्व मानव सभ्यता का मूल : रजनी बख्शी

मानव सभ्यता के मूल में सहयोग और सहअस्तित्व रहा है न कि संघर्ष और हिंसा. मानव की मूल प्रवृत्ति में हिंसा और संघर्ष प्राकृतिक नहीं है.  बल्कि यह हमें सिखाया जाता है. हिंसा मनुष्य का सीखा हुआ व्यवहार है.

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रायपुर. मानव सभ्यता के मूल में सहयोग और सहअस्तित्व रहा है न कि संघर्ष और हिंसा. मानव की मूल प्रवृत्ति में हिंसा और संघर्ष प्राकृतिक नहीं है.  बल्कि यह हमें सिखाया जाता है. हिंसा मनुष्य का सीखा हुआ व्यवहार है. उक्त बातें वरिष्ठ पत्रकार व गांधीवादी लेखिका रजनी बख्शी नई कहीं .

शासकीय दूधाधारी बजरंग महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय एवं अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में अहिंसा एवं सत्य की चुनौती विषयक एकदिवसीय सेमिनार आयोजित हुआ. सेमिनार में महाविद्यालय की छात्राओं के साथ-साथ प्राध्यापकों व शहर के अन्य महाविद्यालय के भी छात्रों- शोधार्थियों ने हिस्सा लिया. इसकी अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. किरण गजपाल ने एवं संचालन महाविद्यालय की आईक्यूएसी की प्रभारी डॉ. उषा किरण अग्रवाल ने किया.

सेमिनार के प्रथम सत्र में मुख्य वक्ता के बतौर मुंबई से आई वरिष्ठ पत्रकार व गांधीवादी लेखिका रजनी बख्शी शामिल हुई. उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में अहिंसा को परम धर्म माना गया है. अहिंसा के लिए निर्भयता आवश्यक है. उन्होंने कहा कि अहिंसा और सत्य को निजी जीवन व्यवहार और वैश्विक- दोनों स्तरों पर देखने की जरूरत है. कुछ लोगों को लगता है कि गांधी से ही अहिंसा शुरू होती है और उनकी हत्या के साथ ही अहिंसा खत्म होती है, किन्तु यह बात सत्य नहीं है.

आगे उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की हुई घटना के विभिन्न आयामों पर विस्तृत बातचीत करते हुए मोहन से महात्मा बनने की पूरी प्रक्रिया को रेखांकित करते हुए कहा कि अक्सर गांधी की अहिंसा को निरीह व लाचार लोगों के अस्त्र के रूप में पेश किया जाता है. किन्तु गांधी के लिए अहिंसा चरम वीरता की परिचायक है.

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गांधी की अहिंसा में कायरता के लिए कोई स्थान नहीं है. उन्होंने कहा कि मानव सभ्यता के मूल में सहयोग और सहअस्तित्व रहा है न कि संघर्ष और हिंसा. मानव की मूल प्रवृत्ति में हिंसा और संघर्ष प्राकृतिक नहीं है.  बल्कि यह हमें सिखाया जाता है. हिंसा मनुष्य का सीखा हुआ व्यवहार है. वैश्विक स्तर पर अहिंसा के प्रयोगों पर ही उन्होंने विस्तृत प्रकाश डालते हुए युद्धोन्माद व हिंसा को मानव अस्तित्व के लिए खतरा बताया और आपसी प्रेम व सद्भावना बढ़ाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया.

द्वितीय सत्र को संबोधित करते हुए दुर्ग से आए छत्तीसगढ़ के चर्चित साहित्यकार विनोद साव ने कहा कि गांधी सादगी पसंद करते थे और वे अपनी सादगी से सत्ता और समाज दोनों को प्रभावित करते थे. गांधी की भाषा भी सादगी और सरलता से ओतप्रोत थी, जिससे आमलोग आकर्षित हुई थी.  उन्होंने गांधी जी के रायपुर और दुर्ग आगमन से जुड़े अनुभवों की विस्तृत चर्चा करते हुए उनके जीवन के विभिन्न प्रयोगों, सभ्यता विमर्श और स्वराज्य की परिकल्पना की विस्तृत चर्चा की.

वहीं अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के राज्य प्रमुख सुनील कुमार साह ने कहा कि यह सत्य और अहिंसा के विस्मृति का दौर है. वैश्विक स्तर पर एक अंधाधुंध होड़ मची हुई है. यह होड़ हिंसा उत्पन्न करने वाली है.  हमें वैश्विक स्तर पर सत्य और अहिंसा की संभावनाओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा. गांधी अपने दौर में जिस प्रकार सत्य के साथ खड़े हुए थे, उससे हमें प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए.  युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा कि युवाओं को किसी भी तथ्य अथवा कथ्य को आँख मूँद कर मानने के बजाय जांच-परख करना चाहिए। प्रत्येक चीज को सत्य की कसौटी पर कसना चाहिए.

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य डॉ. किरण गजपाल ने कहा कि गांधी सत्य के आग्रही थे.  वे सत्य को ईश्वर मानते थे.  गांधी मनसा, वाचा और कर्मणा सत्य और अहिंसा का पालन करना आवश्यक मानते थे.  उनके विचारों के मूल में सत्य और अहिंसा को प्रधानता रही है.

सेमिनार के प्रारम्भ में संगीत विभाग की छात्राओं के द्वारा गांधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ और ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन प्रस्तुत किया.  वहीं अंग्रेजी विभाग की छात्राओं ने विभागाध्यक्ष डॉ. जया तिवारी के निर्देशन में ‘राजकोट से राजघाट तक’ नाटक प्रस्तुत किया.  कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किया गया. आभार ज्ञापन महाविद्यालय की प्राध्यापक डॉ. सविता मिश्रा ने किया.

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