अब्बास हिन्दी फिल्मों के नये आन्दोलन के अगुआ

अब्बास हिन्दी फिल्मों के नये आन्दोलन के अगुआ थे। एक आस्थावान रचना संसार के प्रणेता के रूप में वह भ्रष्ट समाज व्यवस्था से लगातार हर फिल्म में यही सवाल करते रहे हैं- ‘क्या मनुष्य के हौसले आखिरकार परास्त किये जा सकते है?‘ इस प्रश्न के उत्तर में ही अब्बास की कला की सार्थकता है।

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ख्वाजा अहमद अब्बास हिन्दी फिल्मों के नये आन्दोलन के अगुआ थे। एक आस्थावान रचना संसार के प्रणेता के रूप में वह भ्रष्ट समाज व्यवस्था से लगातार हर फिल्म में यही सवाल करते रहे हैं- ‘क्या मनुष्य के हौसले आखिरकार परास्त किये जा सकते है?‘ इस प्रश्न के उत्तर में ही अब्बास की कला की सार्थकता है।

-कनक तिवारी

पुण्यतिथि पर अब्बास की याद

मुम्बइया (तब बम्बइया) फिल्म जगत में सम्भवतः ख्वाजा अहमद अब्बास एक ऐसे अनुभवी निर्माता रहे हैं, जो कई वर्षो तक लेखक, निर्देशक और निर्माता के रूप में एक से एक बढ़िया फिल्में परिष्कृत रुचि के दर्शकों के लिए बनाते रहे। अब्बास में अपने परिवेश के प्रति जागरूकता और सामाजिक उद्देश्य का अद्भुत सांमजस्य रहा है। वैसे कई बार कोई विकल्प न रहने पर कलात्मक चित्रण की अपेक्षा उन्हें ‘प्रोपेगैन्डा‘ भी ज्यादा करना पड़ा है। लेकिन अपनी फिल्मों में विचारोत्तेजक विषय चुनने में अब्बास में प्रचलित रूढ़ियों के विरुद्ध खुला विद्रोह नकारात्मक नहीं था।

अब्बास ने भारतीय फिल्म जगत की चट्टानी राजनीति में अपने हाथों नई राहें तोड़ी थी। एक स्वतंत्र और साहसी फिल्मकार होने के अलावा उनके नेतृत्व में सहकारी आधार पर काम करती उनकी ‘नया संसार‘ फिल्म यूनिट बड़े फिल्म निर्माताओं की ईर्ष्या और जागरूक दर्शको की प्रशंसा की पात्र रही है। नये चेहरे, नायिकाओं की सहज खुरदुरी स्वाभाविकता, मौलिक अभिव्यंजनाओं के प्रयोग और सबसे बढ़कर आशावादिता ने अब्बास के चित्रों के लिए पेशेवर फिल्म-समीक्षकों को नये आलोचना-कोण तलाश करने पर मजबूर किया।

अपनी फिल्मों से ऊपर उठने की सफल कोशिश में उन्होंने उजले भविष्य के संकेत सूत्र भी उनमें गूंथ दिये। अब्बास की फिल्में जागते आदर्शों की गवाह हैं और व्यवसायवादी मुम्बइया फिल्म जगत में उनका प्रदर्शन बिजली की कौंध की तरह रहा है।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि लेकर नौजवान अब्बास ने मुम्बई में ‘बाम्बे क्रानिकल‘ के सम्पादकीय विभाग में काम करना शुरू किया। 1938 से ‘क्रानिकल‘ के फिल्म-समीक्षक की हैसियत से अब्बास ने ‘फार्मूला‘ फिल्मों की धज्जियां उड़ानी शुरू कीं। फिल्म जगत की हस्तियों ने ‘क्रानिकल‘ को सभी विज्ञापन बंद करने की धमकियां दी। फलतः अब्बास को वहां से हटाकर रविवासरीय संस्करण का सम्पादक नियुक्त कर दिया गया।

ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘नया संसार’ pics: cinemaazi.com

1940 में उन्होंने ‘नया संसार‘ की पटकथा लिखी। ‘नया संसार‘ एक ईमानदार नौजवान पत्रकार की कहानी है। अगले वर्ष ही प्रदर्शित इस असाधारण प्रयोगवादी फिल्म ने अब्बास के लिए प्रसिद्धि और सफलता के दरवाजे खोल दिये।

इन्हीं दिनों अब्बास ने उदीयमान फिल्म निर्माता वी. शान्ताराम से युद्ध की पृष्ठभूमि वाली अपनी कहानी को फिल्माने की पेशकश की। सामा्रज्यवादी ताकतों के खिलाफ जूझते हुए महादेश चीन को सहानुभूति के कारण नेहरू के प्रस्तावों के अनुरूप भेजे गये डाक्टर के एक जत्थे तथा उनमें से एक डाक्टर द्वारा चीनी नर्स से विवाह करने और युद्धभूमि पर शहीद हो जाने के तंतुओं से शांताराम ने अपनी अमर फिल्म ‘डा. कोटनीस की अमर कहानी‘ निर्मित की।

बंगाल के प्रसिद्ध अकाल की पृष्ठभूमि पर 1949 में बनी अब्बास की क्लासिक फिल्म ‘धरती के लाल‘ दुर्भिक्ष पीड़ित बंगालियों की कारुणिक मानवीय त्रासदी है। यह हिन्दुस्तान की पहली यथार्थवादी फिल्म थी, यद्यपि ‘नव यथार्थवाद‘ का मुहावरा बरसों बाद इटली से हिन्दुस्तान आयातित हुआ। लन्दन और पेरिस में यथेष्ट प्रशंसित ‘धरती के लाल‘ पहली भारतीय फिल्म थी, जिसका मास्को में प्रदर्शन किया गया।

मुल्कराज आनन्द की एक कथा पर आधारित ‘राही‘ असम के चाय-बागानों के मजदूरों की यंत्रणा का संवेदनशील दस्तावेज, तो 1954 में निर्मित ‘मुन्ना‘ एक गृहविहीन बच्चे के एडवेंचर का प्राणवान ज़िन्दगीनामा है। ‘मुन्ना‘ बाल-फिल्मों में मील का पत्थर सिद्ध हुआ।

पंडित नेहरू ने इस चलचित्र की काफी सराहना की थी। 1955 में जब यह फिल्म एडिनबरा फिल्म महोत्सव में दिखलाई गई तो ‘मैन्चेस्टर गार्जियन‘ ने लिखा कि मेले का सर्वाधिक सुखद आश्चर्य रही यह फिल्म कल्पना तथा भावप्रवणता से ओत-प्रोत थी। 1956 में इसे मास्को में भारतीय फिल्मों की प्रदर्शनी में भी दिखाया गया। लेकिन भारत में यह व्यवसाय की दृष्टि से ‘फ्लाप‘ रही।

अब्बास की ‘चार दिल चार राहें‘ बहुरंगी मानव जीवन की असाधारण शक्तिशाली कथा है। ‘हमारा घर‘ केवल बच्चों द्वारा अभिनीत पहली भारतीय फिल्म है। अब्बास निर्देशित ‘आसमान महल‘ एक भूतपूर्व रियासत में सामंतशाही के युग की समाप्ति और नई सामाजिक शक्तियों के उदय का सूचक है। यह पहली हिन्दुस्तानी फिल्म है, जिसमें स्टूडियो शूटिंग बिल्कुल नहीं की गई।

व्यावसायिक कलाकारों के बदले अब्बास ने इसके सभी चरित्र वास्तविक जीवन से ही चुने। राजकपूर और नर्गिस अभिनीत ‘अनहोनी‘ का निर्माण भी अब्बास ने किया। विदेशों में पर्याप्त ख्याति अर्जित करने के बावजूद बेचारे अब्बास की फिल्में भारत में ‘बाक्स आफिस‘ पर हिट नहीं हो पाईं। लेकिन यह विचित्र संयोग है कि अब्बास लिखित और राजकपूर निर्मित ‘आवारा‘ आर्थिक दृष्टि से काफी सफल रही।

pics: bolywoodfiles.blogspot.com

मास्को में ‘आवारा‘ के प्रदर्शन के समय सोवियत रूस के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री उपस्थित थे। उनके भारत-रूस सहयोग के आधार पर फिल्म निर्माण के प्रस्ताव के उत्तर में अब्बास ने पन्द्रहवीं सदी के रूसी यात्री अफानासी निकितिन की भारत यात्रा के संबंध में फिल्म ‘परदेशी‘ बनाई। यह फिल्म भारत-सोवियत मैत्री का उदाहरण होने के अलावा सांस्कृतिक सहयोग की प्रक्रिया को निरन्तर गतिमान रखने के अब्बास के कूटनीतिक प्रयासों की विजय का भी प्रमाण है।

अब्बास ने ‘आवारा‘ के संवाद लेखक के रूप में अपराध फिल्मों के प्रति अपने आकर्षण को अनजाने ही अभिव्यक्त किया था। उनकी ‘बम्बई रात की बाहों में‘ अपराधों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को व्याख्यायित करने का उपक्रम करती है।

सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ अपने संघर्ष में निरन्तर जूझने वाला पत्रकार अब्बास का प्रिय नायक (और खुद की नियति भी) रहा है। यह फिल्म अपनी विविध घटनाओं, वर्तुल जीवन तरंगों, दृष्य बिम्बों, अतीत चित्रों, विरोधाभासों और विसंगतियों के कारण अनोखी परिस्थितियों का चित्रण करती है। इस फिल्म का प्रस्तुतीकरण और तकनीक नितान्त आधुनिक है। फिल्म सत्यजीत राय की महानगर की सम्पूरक है। समूची फिल्म में कथा के साथ एक अनोखी अन्तर्लय की सृष्टि होती है।

1956 में बम्बई के फुटपाथों पर जीनेवालों की मर्दुमशुमारी की घटना से व्यथित अब्बास ने 1963 में अनेक आर्थिक दिक्कतों के बावजूद ‘शहर और सपना‘ निर्मित की। इस फिल्म पर सेंसर की कैंची बिल्कुल नहीं चली। असाधारण दुखों के बाद भी कथा में साथीपन का जर्बदस्त भाव है और सत्य कड़वा होने पर भी सपने से भी ज्यादा रंगीन है। खानाबदोशों के रैन बसेरे स्थापित व्यवस्था के इशारे पर तोड़े जा सकते हैं, लेकिन उनकी आंखों में किसी बेहतर को पाने के तिरते सपने कुचले नहीं जा सकते।

गोवा को साम्राज्यवादियों की गिरफ्त से छुड़ाने के संदर्भ में वर्षों पूर्व निर्मित ‘सात हिन्दुस्तानी‘ राष्ट्रीय एकता पर अब्बास के विचारों का प्रकाशन है। कहीं कहीं मानव चरित्र का अतिरंजित वर्णन होने के बावजूद अब्बास की केंद्रीय विषय पर पकड़ अच्छी है। स्टार सिस्टम के भंजक के रूप में वह नये चेहरों की तलाश में फिर कामयाब रहे। हालांकि बहुत चाहकर भी वह इस फिल्म के माध्यम से कोई नई बात बहुत कारगर ढंग से नहीं कह पाये।

हिन्दी फिल्म -जगत में ‘नवयथार्थवाद‘ का प्रवर्तक अब्बास एक अरसे से संवेदनशील और जागरूक पत्रकार भी रहा है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय रिश्ते की गरमाहट का प्रतीक होने के बावजूद उसने विश्वयारी के चक्कर में पड़कर इतिहास के तथ्यों में तोड़-मरोड़ और अपने देश की ‘इमेज‘ खराब करने के हर प्रयत्न का कड़ा विरोध किया है।

1961 में जब अमरीकी संस्था ‘ट्वेन्टिएथ सेन्चुरी फाॅक्स‘ ने गांधी की हत्या पर आधारित फिल्म ‘नाइन अवर्स टु रामा‘ में गोडसे के चरित्र को नायक का कलेवर देने की धूर्तता की, तो ख्वाजा अहमद अब्बास भारत के पहले फिल्म समीक्षक और लेखक थे जिन्होंने ‘ब्लिट्ज‘ के ‘आखिरी पृष्ठ‘ के लेखक के रूप में निर्देशक मार्क राब्सन के घिनौने हथकंडों का भंडाफोड़ किया।

फिल्म यूनिट के सदस्यों के एकाएक लन्दन चले जाने पर अब्बास ने व्यंग्योक्ति में कहा, ‘वे रात के अंधेरे में हिन्दुस्तान छोड़कर चले गये क्योंकि उनमें हमारे सवालों का जवाब देने की ताकत नहीं थी। ‘अब्बास ने इस सिलसिले में भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भी आड़े हाथों लिया।

भारतीय फिल्म उद्योग में व्याप्त अनेक अनियमितताओं के कारण अब्बास ने हमेशा मांग की कि समूचे फिल्म-उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाना चाहिए। फिल्मों में अश्लीलता के सवाल को लेकर भी अब्बास की बहुत साफ धारणा थी।

‘खोसला कमेटी ने तमाम महत्वपूर्ण बातों के साथ यह भी कहा है कि चुम्बन की अभिव्यक्ति के लिए जो दूसरे तरीके फिल्म में अपनाए जाते हैं, उससे अनिवार्य अगर आवश्यकता हो तो चुम्बन दिखलाया जा सकता है। नंगे घूमने वाले साधुओं के देश में ‘न्यूडिटी‘ पर इतना हो-हल्ला जंचता नहीं। हमारी फिल्मों में सहज चुम्बन नहीं दिखाकर इशारेबाजी होती है। वह इशारेबाजी ही सारी गंदगी की जड़ है। फिल्मों में जो ‘वल्गैरिटी है, वह समाज से ही ली जाती है।

अब्बास हिन्दी फिल्मों के नये आन्दोलन के अगुआ थे। एक आस्थावान रचना संसार के प्रणेता के रूप में वह भ्रष्ट समाज व्यवस्था से लगातार हर फिल्म में यही सवाल करते रहे हैं- ‘क्या मनुष्य के हौसले आखिरकार परास्त किये जा सकते है?‘ इस प्रश्न के उत्तर में ही अब्बास की कला की सार्थकता है।

(लेखक संविधान मर्मज्ञ,गांधीवादी चिन्तक और छत्तीसगढ़ के पूर्व महाधिवक्ता हैं |  यह उनका निजी विचार है|  deshdigital.in  असहमतियों का भी स्वागत करता है)

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