छत्तीसगढ़ : ताजपोशी की तरह शक्ति प्रदर्शन के क्या मायने हैं ?

ताजपोशी की तरह शक्ति प्रदर्शन के क्या मायने या संदेश हैं ? सिंहदेव पर वृहस्पत सिंह का हमला क्या सुनियोजित था? आगामी सप्ताह में या कुछ सप्ताह में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जब राज्य का दौरा करेगा, उसके बाद ही बहुत कुछ साफ होगा। देखना दिलचस्प होगा कि हाईकमान के दौरे के दरम्यिान भी इसी तरह का कितना, किस स्तर का शक्ति प्रदर्शन होगा ?

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छत्तीसगढ़ में सरकार के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सत्ता संघर्ष का जो घमासान जारी है, वह इस समय कुछेक दिनों या कुछेक सप्ताह के लिए टला मात्र है। ताजपोशी की तरह शक्ति प्रदर्शन के क्या मायने या संदेश हैं ? सिंहदेव पर वृहस्पत सिंह का हमला क्या सुनियोजित था? आगामी सप्ताह में या कुछ सप्ताह में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जब राज्य का दौरा करेगा, उसके बाद ही बहुत कुछ साफ होगा। देखना दिलचस्प होगा कि हाईकमान के दौरे के दरम्यिान भी इसी तरह का कितना, किस स्तर का शक्ति प्रदर्शन होगा ?

डॉ. लखन चौधरी

छत्तीसगढ़ में सरकार के नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सत्ता संघर्ष का जो घमासान जारी है, वह इस समय कुछेक दिनों या कुछेक सप्ताह के लिए टला मात्र है। फिलहाल इस सत्ता संघर्ष का स्थायी, संतोषजनक या सर्वमान्य समाधान निकला नहीं है। और इसे इस तरह कहें कि इस राजनीतिक उठापटक का समाधान निकालने में कांग्रेस का आलाकमान राजस्थान एवं पंजाब की तरह नाकाम रहा है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

बीते सप्ताह भर से चले आ रहे राजनीतिक उठापटक या कहें राजनीतिक अस्थिरता को लेकर जो नाटकीय नुरा-कुश्ती चल रही है, वह आने वाले समय में घुन बनकर कांग्रेस को खोखला कर देगी, करती रहेगी। इतना ही नहीं 2023 के आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसका जहां भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा, वहीं भाजपा को इसका बड़ा लाभ मिल सकता है।

सप्ताह भर से चले आ रहे नाटकीय घटनाक्रम को भूपेश बघेल के समर्थक, प्रदेश का बहुसंख्यक बुद्धिजीवी वर्ग और कई मीडिया समूह भले ही मामले का पटाक्षेप  मानकर चल रहे हों, लेकिन मामला अभी दबा नहीं, मात्र दबाया गया है। इसकी कई वजहें हैं, लेकिन राजस्थान एवं पंजाब में कांग्रेस की स्थिति इसकी सबसे बड़ी वजह है।

जो भी हो, बघेल समर्थकों के सारे दावे एवं वादे उस वक्त धराशायी हो गये या हो जाते हैं जब सिंहदेव कहते हैं कि ’कोई चीज स्थायी है तो वह है परिवर्तन, पूरी बात हाईकमान के संज्ञान में है, जल्द होगा निर्णय। अंतिम निर्णय हाईकमान के पास सुरक्षित है। वे आगे कहते हैं कुछ बातें रहती हैं, जिनके लिए समय लगता है। हाईकमान ने बातों को संज्ञान में लिया है। जल्द ही कुछ निर्णय होगा।’ इसका मतलब साफ है कि मामला अभी सुलझा नहीं है और आने वाले दिनों में सत्ता संघर्ष का यह घमासान जारी रहेगा।

आगामी सप्ताह में या कुछ सप्ताह में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जब राज्य का दौरा करेगा, उसके बाद ही बहुत कुछ साफ होगा। देखना दिलचस्प होगा कि हाईकमान के दौरे के दरम्यिान भी इसी तरह का कितना, किस स्तर का शक्ति प्रदर्शन होगा ? दूसरा खेमा किस तरह की रणनीति अपनायेगा ? स्थानीय जनमानस किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है ? राज्य के जनप्रतिनिधि किस तरह अपनी राय देते हैं ?

कई सवाल हैं, मगर यह तय है कि सरकार का बचा हुआ दो-सवा दो साल का कार्यकाल अब इसी तरह सत्ता संघर्ष में गुजरेगा। और, छत्तीसगढ़ का यह सत्ता संघर्ष प्रदेश के सारे संसाधन एवं यहां की विकास की सारी संभावनाओं को खा जाएगा। अब राज्य में कांग्रेस अपनी सत्ता बनाये रखने एवं बचाये रखने के लिए ही अपनी पूरी ताकत लगायेगी। जबकि इस तरह की स्थिति की यहां कोई गुंजाइश ही नहीं थी।

दरअसल छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को मिला बड़ा बहुमत ही अब कांग्रेस के लिए भारी पड़ता नजर आ रहा है। कांग्रेस की मूर्खताएं, कांग्रेस के भीतर का अत्यधिक लोकतंत्र, केन्द्र में शीर्ष नेतृत्व का अभाव या शीर्ष नेतृत्व की निर्णय लेने की अक्षमता अथवा निर्णयों को लंबे समय तक टालने, टालते रहने की प्रवृत्ति कांग्रेस के लिए जानलेवा सिद्ध होती जा रही है। इसका फायदा केन्द्र में बैठी सरकार उठा रही है।

कांग्रेस की इन्हीं कमजोरियों के चलते मोदी सरकार तानाशाही तरीके से या कारपोरेट की तरह सरकार चला रही है। आर्थिक बदहाली, महंगाई, बेराजगारी जैसी समस्याएं आम आदमी की जिंदगी में जहर घोल रही हैं, इसके बावजूद सरकार बेफ्रिक एवं निश्चिन्त  है क्योंकि देश  में विपक्ष नाम की कोई चीज बची नहीं है। यदि कहीं है तो वह इतनी अक्षम, नाकारा और बंटी हुई है कि उनसे कोई उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

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इधर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बिगड़ती स्थिति के कुछ और कारण भी हैं। सरकार के भीतर विभिन्न विभागों के मंत्रियों में आपसी तालमेल एवं समन्वय का अभाव दिखलाई देने लगा है। आम आदमी के काम नहीं हो रहे हैं। जातिवाद की राजनीति चरम में है। मुख्यमंत्री पद के दावेदार वाले दोनों मंत्रियों सहित कई वरिष्ठ मंत्रियों के पर इस कदर कतर दिये गये हैं कि उनमें से एक तो अब उड़ने के लायक ही नहीं बचे हैं। तमाम सरकारी योजनाओं एवं कार्यक्रमों में भष्ट्राचार लगातार बढ़ता जा रहा है।

केन्द्र की तरह मुख्यमंत्री का चेहरा या इमेज चमकाने के लिए भारी भरकम विज्ञापनों का सहारा लिया जा रहा है जो गैर जरूरी है। बेवजह के शक्ति प्रदर्शन किये जा रहे हैं। अफसरशाही बेलगाम है। मुफ्तखोरी की राजनीति करदाताओं को चुभने लगी है। पिछले दो-तीन महीनों में इसके अतिरिक्त सरकार के स्तर पर कई गैर जरूरी ऐसे निर्णय हुए हैं, जिससे कांग्रेस का ही एक खेमा उपेक्षित एवं अपमानित महसूस कर रहा है। आखिरकार  क्यों इसकी जरूरत पड़ी ?

 

ताजपोशी की तरह शक्ति प्रदर्शन के क्या मायने या संदेश हैं ? सिंहदेव पर वृहस्पत सिंह का हमला क्या सुनियोजित था ? ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधाओं को बढ़ाने एवं बेहतर बनाने के लिए राज्य में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन एवं सब्सिडी देकर स्वास्थ्य ढ़ांचा विकसित करने की योजना पर स्वास्थ्य मंत्री की उपेक्षा क्यों की गई ?

टी एस सिंहदेव जब वृहस्पत सिंह के आरोपों के बाद विधानसभा से बाहर निकल गये

कोरोना से लड़ने में भी सिंहदेव से मतभेद की खबरें मीडिया तक आती रहीं हैं। इस तरह के कई छोटे-बड़े मुद्दे हैं, जो बेवजह एवं गैर जरूरी थे जिससे सरकार की इमेज खराब हुई है। अंततः कांग्रेस के लिए मामला अब भी बहुत नाजुक है।

भूपेश बघेल के लिए बचा कार्यकाल कांटों की ताज की तरह होगा। सिंहदेव का रास्ता भी कम कांटोभरा नहीं है। मगर राज्य के जनप्रतिनिधियों खासकर विधायकों के लिए सुनहरा अवसर है। विधायकों की जमकर खरीद-फरोख्त होगी। इसका फायदा नौकरशाही उठायेगा। सरकारी संसाधनों एवं संपत्तियों की अंधाधुंध हेराफेरी होगी। जनता की बदहाली बढ़ेगी। रोजगार के अवसर घटेंगे।

कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में नई पीढ़ी के लिए अब बहुत चिंताजनक स्थिति आने वाली है। यकीनन, राज्य में कांग्रेस आज एक ऐसे मोड़  या दोराहे पर आकर खड़ी हो गई है जहां से आगे जाने का रास्ता बेहद चुनौतीपूर्णं है, मगर दुर्भाग्य यह है कि यह स्थिति कांग्रेस की अपनी मूर्खताओं एवं अति महात्वाकांक्षा बनाम अति आत्मविश्वास की वजह से पैदा हुई है।

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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