छत्तीसगढ़ : प्रोफेसर भर्ती में आयु सीमा की भारी विसंगति

छत्तीसगढ़ बनने के बाद राज्य में पहली बार प्रोफेसर पदों पर भर्ती होने जा रही है। राज्य के शासकीय महाविद्यालयों के लिए 595 प्रोफेसर पदों की सीधी भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग के माध्यम से विज्ञापन जारी किया है।अब जब 30 साल बाद भर्ती होनेे जा रही है, तो इसमें सरकार की ओर से अनेकों प्रकार की विसंगतियां डाल दी गई हैं। जिसको लेकर राज्य के सहायक प्राध्यापकों में भारी असंतोष एवं नाराजगी है।

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नई भर्ती हेतु जारी विज्ञापन के अनुसार प्रोफेसर पद के लिए सामान्य उम्मीदवारों के लिए 45 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित है। जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार सहायक प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक एवं प्राध्यापक किसी भी पद के लिए आयु सीमा का कोई बंधन नहीं रहता है। शैक्षणिक योग्यता एवं अन्य सभी नियम-शर्तें जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार हैं तो फिर आयु बंधन क्यों ? राज्य के या केन्द्र के विश्वविद्यालयों में भी भर्ती में आयु सीमा का कोई बंधन नहीं रहता है, फिर लोक सेवा आयोग की भर्ती में क्यों है ?

डाॅ. लखन चौधरी

छत्तीसगढ़ बनने के बाद राज्य में पहली बार प्रोफेसर पदों पर भर्ती होने जा रही है। राज्य के शासकीय महाविद्यालयों के लिए 595 प्रोफेसर पदों की सीधी भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग के माध्यम से विज्ञापन जारी किया है। उल्लेखनीय है कि नया राज्य बनने के पूर्व 1990 से लेकर 2021 तक प्रदेश में प्रोफेसर पद पर भर्ती नहीं हुई है। अब जब 30 साल बाद भर्ती होनेे जा रही है, तो इसमें सरकार की ओर से अनेकों प्रकार की विसंगतियां डाल दी गई हैं। जिसको लेकर राज्य के सहायक प्राध्यापकों में भारी असंतोष एवं नाराजगी है।

नई भर्ती हेतु जारी विज्ञापन के अनुसार प्रोफेसर पद के लिए सामान्य उम्मीदवारों के लिए 45 वर्ष की आयु सीमा निर्धारित है। जबकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार सहायक प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक एवं प्राध्यापक किसी भी पद के लिए आयु सीमा का कोई बंधन नहीं रहता है। शैक्षणिक योग्यता एवं अन्य सभी नियम-शर्तें जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार हैं तो फिर आयु बंधन क्यों ? राज्य के या केन्द्र के विश्वविद्यालयों में भी भर्ती में आयु सीमा का कोई बंधन नहीं रहता है, फिर लोक सेवा आयोग की भर्ती में क्यों है ? यह समझ से परे है।

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दूसरी विसंगति आयु सीमा में राज्य के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थी को 5 वर्ष की, महिलाओं को 10 वर्ष की छूट दी जा रही है तो फिर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी के साथ भेदभाव क्यों ? राज्य के स्थानीयता का लाभ या छूट सभी वर्ग के उम्मीदवार को मिलेगा लेकिन सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी को नहीं मिलेगा, ऐसा क्यों ? अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग के महिला अभ्यर्थी को 15 वर्ष की छूट क्यों ? साफ है इससे सबसे अधिक नुकसान सामान्य एवं ओबीसी वर्ग के पुरूष अभ्यर्थियों का होगा, जो 45 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं वे सीधे तौर पर इस भर्ती से ही बाहर हो जायेंगे।

 राज्य बनने के बाद अभी तक प्रोफेसर पद पर कोई भर्ती ही नहीं हुई है, ऐसे में इस तरह के नियम-शर्तें बनाने का मकसद राज्य के बाहरी उम्मीदारों को अवसर देना है। इससे राज्य के बाहर के या निजी महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में कार्यरत अभ्यर्थियों को मौका मिलेगा और राज्य के योग्यताधारी सहायक प्रध्यापक बाहर हो जायेंगे।

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राज्य के जिन अभ्यर्थियों के पास आवश्यक योग्यता है, वे आयु बंधन में बाहर हो जायेंगे और जो आयु सीमा के भीतर हैं उनके पास आवश्यक अर्हताएं नहीं हैं। साफ है इससे राज्य के अभ्यर्थियों का चयन नहीं हो पायेगा और सारे बाहरी लोगों को मौका मिलेगा। सरकार या तो भर्ती करना नहीं चाहती है, या बाहरी लोगों को लेकर राज्य के लोगों को इस प्रक्रिया से ही बाहर कर देना चाहती है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्णं है।

एक तरफ सरकार का कहना है कि राज्य के महाविद्यालयों में प्रोफेसर के पद नहीं होने के कारण ’नैक’ मूल्यांकन में संतोषजनक ग्रेड नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकार के नौकरशाह ऐसे नियम-शर्तें बना रहे हैं कि जो बेहद विसंगतिपूर्णं है। यहां प्राध्यापक के 595 पदों के विज्ञापन से छत्तीसगढ़ के बाहर के लोगों को मौका मिलेगा, और स्थानीय लोग बाहर हो जायेंगे।

ज्ञातव्य है कि राज्य में 1990 के पश्चात प्राध्यापकों की सीधी भर्ती नहीं  हुई है ,जिसके कारण 1993 में पीएससी से चयनित प्रायः सभी सहायक प्राध्यापक निर्धारित उम्र सीमा 45 साल को पार कर चुके हैं, वही दूसरी ओर 2012 में पीएससी से भर्ती सहायक प्राध्यापक अध्यापन अनुभव 10 वर्ष नहीं होने के कारण आवेदन से वंचित हो रहे हैं।

इस प्रकार से वर्तमान में छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांशतः सहायक प्राध्यापक प्राध्यापक के दौड़ से बाहर हो गए हैं । इसके साथ ही शायद उच्च शिक्षा विभाग पूरे विभागों में ऐसा विभाग होगा, जहां कार्यरत शिक्षक को दो बार परिवीक्षा अवधि से गुजरना होगा, वह भी स्टायपण्ड जैसी अदभुत योजना के साथ, जिसमे प्रथम तीन वर्षों में मूल वेतन का 70, 80 ,90 प्रतिशत प्रदान कर पदोन्नति को सम्मानित किया जाएगा। जब विभाग 10 वर्ष की न्यूनतम अनुभव की बात करता है तो वही दूसरी तरफ पुनः परिवीक्षा अवधि का निर्धारण विधिसम्मत नहीं है, साथ ही मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 14,16 ,19 व 21 का सीधा सीधा उल्लंघन है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार राज्य के शासकीय महाविद्यालयों में इस समय एक भी एसोसिएट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि इसका उल्लेख छत्तीसगढ़ के राजपत्र 16 जनवरी 2019 में किया गया है तथा भारत के राजपत्र 18 जुलाई 2018 में भी प्रावधानित है, इसके लिए सरकार चिंतिंत नहीं है लेकिन प्रोफेसर के सीधी भर्ती के लिए विज्ञापन जारी कर रही है। इसी के साथ एसोसिएट प्रोफेसर के लिए भी भर्ती निकाला जाना चाहिए।

दरअसल में राज्य की नौकरशाहों की मनमानी के चलते राज्य में सहायक प्रोफेसरों को एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत नहीं किया जा रहा है, वहीं प्रोफेसर भर्ती में विसंगतिपूर्णं नियम-शर्तें बनाकर बाहरी लोगों के रास्ता बनाया जा रहा है। इस तरह की विसंगतिपूर्णं भर्ती विज्ञापन को तत्काल वापस लेकर नये सिरे भर्ती विज्ञापन जारी किये जाने की जरूरत है जिसमें एसोसिएट प्रोफेसर के लिए भी भर्ती शामिल हो।

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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