धर्म निरपेक्षता एवं धार्मिक शिक्षा

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हमने धर्म निरपेक्षता का बहुत ही संकुचित अर्थ लगाया है। धर्म निरपेक्ष राज्य का अर्थ धर्म विहिन राज्य से नहीं है। इस संकुचित अर्थ के कारण बड़ा अनर्थ हुआ है । शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। विद्यालय पर बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास करने का उत्तरदायित्व है। वह अपने इस उत्तरदायित्व का निर्वाह तभी कर सकता है जब उसे धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान करे|
-डॉ. अजय सिंह

धर्म का अर्थ धारण करने से है| मानव अपने जीवन में जिन नियमों एवं मूल्यों को धारण करता है। वही उसका धर्म है। किन नियमों को धारण किया है ? इस प्रश्न के उत्तर में मत-भिन्नता है और इसी मत भिन्नता के कारण नये-नये धर्मों की उत्पत्ति हुई है और हो रही है। संकुचित अर्थ में धर्म का अर्थ अन्ध-विश्वास करना, माला जपना, मंदिर जाना, तिलक लगाना आदि क्रियाओं से लगाया जाता है। व्यापक अर्थों में धर्म का तात्पर्य ह्रदय को पवित्र बनाना, उत्तम चरित्र एवं नैतिकता प्राप्त करना, मन में आध्यात्मिक मूल्यों को स्थापित करना आदि क्रियाएं आती है।

धर्म, शिक्षा एवं नैतिकता के बीच घनिष्ठ संबंध है। प्राचीन और मध्यकाल में यह संबंध अत्यंत घनिष्ट था। संसार के सभी देशों में शिक्षा धार्मिक पुरूषों, पादरियों, मौलवियों, ऋषियों तथा मुनियों द्वारा दी जाती थी और धार्मिक स्थान ही शिक्षा संस्था के रूप में कार्य करते थे । दोनों का लक्ष्य मानव का नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास करना है धर्म और नैतिकता को एक दूसरे से पृथक करना असंभव है । धर्म का सार नैतिकता है और नैतिकता का आधार धर्म है। नैतिक मूल्यों का विकास धार्मिक विश्वासों से होता है। व्यक्ति की नैतिक प्रगति, उसके धार्मिक दृष्टिकोण पर निर्भर रहती है।

अंग्रेजों ने शिक्षा को धर्म से अलग रखकर धार्मिक तटस्थता की नीति अपनाई । स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय सरकार ने साम्प्रदायिक समस्याओं के कारण इसी नीति का अनुसरण किया और धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की। हमारे संविधान में 25वीं धारा के अंतर्गत यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि सभी नागरिकों को अपना-अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता है किन्तु किसी अनुदान प्राप्त विश्वविद्यालय द्वारा किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा नहीं दी जायेगी।

यह वर्तमान भारतीय राजनीति की एक संकुचित धारणा है। हमने धर्म निरपेक्षता का बहुत ही संकुचित अर्थ लगाया है। धर्म निरपेक्ष राज्य का अर्थ धर्म विहिन राज्य से नहीं है। इस संकुचित अर्थ के कारण बड़ा अनर्थ हुआ है । शिक्षा का उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है। विद्यालय पर बालक के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास करने का उत्तरदायित्व है। वह अपने इस उत्तरदायित्व का निर्वाह तभी कर सकता है जब उसे धार्मिक और नैतिक शिक्षा प्रदान करे|

मैने इस लेख में धर्म निरपेक्षता एवं धार्मिक शिक्षा के स्वरूप का विश्लेष्ण करने का प्रयास किया है । मनुष्य का चरित ही उसके जीवन में उत्थान और पतन, सफलता और असफलता का सूचक  है अत: यदि हम बालक को सफल व्यक्ति, उत्तम नागरिक और समाज का उपयोगी सदस्य तथा उसके अंदर प्रेम, त्याग, सहनशीलता, आत्म विश्वास एवं उत्साह उत्पन्न करना, अनुशासन, मानसिक शांति एवं संतोष उत्पन्न करना चाहते हैं तो उसके चरित्र का निर्माण किया जाना परम आवश्यक है।

बालकों में आत्म विश्वास एवं उत्साह नैतिक मूल्यों के कारण उत्पन्न होता है। यह तभी संभव है जब उसके लिए धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा की व्यवस्था की जाय । इसका समर्थन माध्यमिक शिक्षा आयोग ने भी किया है। उसने लिखा है- “चरित्र के विकास में धार्मिक और नैतिक शिक्षा महत्वपूर्ण योग देती हैं” यदि हम अपनी सभ्यता को सुरक्षित और विकसित करना चाहते हैं तो प्रत्येक शिक्षा संस्था में धार्मिक नैतिक शिक्षा का उपयुक्त आयोजन किया जाना आवश्यक है।

इस संबंध में रॉस (ROSS) के यह शब्द सारगर्भित है – “आज अधिकाधिक विचारशील लोगों का विश्वास यह हो गया है कि यदि हम शिक्षा द्वारा उच्च कोटि की सभ्यता का निर्माण करना और उसको बनाये रखना चाहते हैं. तो शिक्षा को धर्म पर आधारित किया जाना आवश्यक है।”

चूंकि धर्म ही मानवीय एवं नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित करता है इसलिए धर्म विहिन शिक्षा के कारण अधर्म, चरित्रहीनता, भ्रष्टाचार आदि अनैतिक कार्यों की वृद्धि हो रही है समाज दुर्बल हो रहा है और देश के नवयुवक बिना किसी मूल्य एवं आदर्श के बढ़ रहे हैं। अत: धर्म विहीन शिक्षा की नीति के विरोध स्वरूप भारतीय विचार को एवं शिक्षाविदों ने शिक्षा में धर्म एवं नैतिकता को फिर से एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया ।

(लेखक डॉ. अजय सिंह इतिहास के प्राध्यापक हैं, यह इनके निजी विचार हैं )

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