विश्वविद्यालयों में स्थानीय कुलपति क्यों ?

आखिरकार कुलपति चयन के लिए मानदण्ड क्या है, क्या हो और क्या होने चाहिए ? मेरिट या ’अ-मेरिट’ पैमाने जिसे सियासत और सियासतदां तय करते हैं ? जिसे सरकारें तय करती हैं ? जो पिछले कुछ दशकों से लगातार जारी हैं ?

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आखिरकार कुलपति चयन के लिए मानदण्ड क्या है, क्या हो और क्या होने चाहिए ? मेरिट या ’अ-मेरिट’ पैमाने जिसे सियासत और सियासतदां तय करते हैं ? जिसे सरकारें तय करती हैं ? जो पिछले कुछ दशकों से लगातार जारी हैं ? क्या संवैधानिक प्रक्रियाओं के नाम होने वाली नियुक्तियों में मेरिट मानदण्डों का पालन होता है, हो रहा है ? दोनों स्थितियों में, आज का सबसे बड़ा सवाल यही है ?

-डॉ. लखन चौधरी

कुलपति चयन पर जारी घमासान, जिम्मेदार कौन ? (3)

विश्वविद्यालयों में कुलपति पद के लिए स्थानीय व्यक्ति की क्या एवं क्यों जरूरत है ? स्थानीय व्यक्ति के कुलपति होने से विश्वविद्यालयों को क्या फायदा होता है या हो सकता है ? स्थानीय व्यक्ति से विश्वविद्यालयों को क्या-क्या लाभ हो सकता है ? ठीक इसी तरह इसके विपरीत भी, कि बाहरी व्यक्ति से विश्वविद्यालयों के क्या नफा-नुकसान होते हैं या हो सकते हैं ? असल सवाल यही होना चाहिए।

दोनों के अपने-अपने नफा-नुकसान हैं। जहां स्थानीय प्रतिभा से स्थानीय प्रतिभाशाली व्यक्तियों को अवसर मिलता है, या मिल सकता है, लेकिन स्थानीय सियासत भी हमेशा हावी रहती है। वहीं बाहरी कुलपतियों से विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती है।

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बाहर के प्रतिभावान व्यक्तियों के माध्यम से स्थानीय अवसरों एवं संभावनाओं को निखारते हुए विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय पहचान स्थापित की जा सकती है। लेकिन, कई बार यह भी होता है कि बाहरी व्यक्ति स्थानीय प्रतिभाओं की अनदेखी करते हुए बाहरी व्यक्तियों को भरना आरंभ कर देते हैं। इससे कालान्तर में विश्वविद्यालयों की स्थानीय विकास की स्थापना के मूल मकसद ध्वस्त हो जाते हैं।

फिर सवाल बचता है कि आखिरकार कुलपति चयन के लिए मानदण्ड क्या है, क्या हो और क्या होने चाहिए ? मेरिट या ’अ-मेरिट’ पैमाने जिसे सियासत और सियासतदां तय करते हैं ? जिसे सरकारें तय करती हैं ? जो पिछले कुछ दशकों से लगातार जारी हैं ?

क्या संवैधानिक प्रक्रियाओं के नाम होने वाली नियुक्तियों में मेरिट मानदण्डों का पालन होता है, हो रहा है ? दोनों स्थितियों में, आज का सबसे बड़ा सवाल यही है ? जिसका जवाब संभवतया फिलहाल नहीं दिखता है।

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इस समय उच्चशिक्षा की यही सबसे बड़ी विडम्बना है। बातें नालन्दा और तक्षशिला को पुनर्स्थापित करने की होती रहती हैं, लेकिन उसके प्रयास, प्रक्रियाएं एवं उपाय कहीं से परिलक्षित नहीं होते हैं। केवल परीक्षाएं कराना एवं अपने लोगों को भरना, विश्वविद्यालयों का मकसद रह गया है या बनता जा रहा है। सरकार राजभवन पर दबाव बनाकर अपने लोगों को भरना चाहती है। राजभवन संवैधानिकता की आड़ में लगातार बाहरी लोगों को भरती जा रही है। चौदह में नौ इसके प्रमाण हैं।

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इधर राज्य में पिछले सप्ताह भर से जारी कुलपति चयन विवाद फिलहाल थमता दिख रहा है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापक संघ एवं प्रतिनिधि मण्डल पर राजभवन की कथित तौर पर नाराजगी एवं झिड़की के बाद मामला तब तक के लिए थम गया है, जब तक इस विश्वविद्यालय के कुलपति की घोषणा नहीं हो जाती है। लेकिन यकीन मानिए जब अगले कुलपति की नियुक्ति की घोषणा होगी तब दोनों ही स्थिति में असंतोष होना तय है।

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स्थानीय व्यक्ति के कुलपति बनने से बाहरी लॉबी सक्रिय होगी, जिसे केन्द्र एवं विपक्ष का सहयोग एवं समर्थन मिलेगा या मिलता रहा है। वहीं स्थानीय के बजाय बाहरी व्यक्ति के कुलपति बनने से सरकार की सहनशीलता एवं दूरदर्शिता की चर्चा होगी। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर लगता नहीं है कि सरकार चुप रहेगी।

कुल मिलाकर देखा जाये तो विश्वविद्यालययों की स्थापना, संचालन, प्रबंधन, प्रशासन, व्यवस्थापन से लेकर उसकी प्रतिष्ठा एवं पहचान स्थापित करने-कराने में कुलपतियों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालों या दशकों से इस तरह की प्रवृत्तियां पनप नहीं पा रहीं हैं। सरकारें विश्वविद्यालयों की महज स्थापना करके मान ले रही हैं कि उच्चशिक्षा का विकास एवं प्रचार-प्रसार हो रहा है। यकीन मानिए, जब तक कुलपतियों की प्रतिष्ठाओं एवं कुलपति पद की गरिमा को सरकारें वापस पुनर्स्थापित नहीं करेंगी तब तक विश्वविद्यालयों एवं उच्चशिक्षा की खोई हुई प्रतिष्ठा बहाल नहीं हो सकती है।

क्रमशः

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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