बिंताघाटी,  बोधघाट परियोजना के खिलाफ, बैठकों का दौर

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बस्तर | बस्तर संभाग के बिंताघाटी की 17 पंचायतों के 42 गांव में बसे ग्रामीण परियोजना के खिलाफ हैं और विरोध में लगातार बैठकें कर रहे हैं। घाटी के किसानों का कहना है कि सबसे बढ़िया कृषि भूमि को छोड़कर हम नहीं जाएंगे। सरकार उन्हें बलपूर्वक विस्थापित करती है तो मजबूरीवश गांव छोड़ना ही पड़ेगा।

क्या है बोधघाट परियोजना

इंद्रावती नदी पर बारसूर के पास इस परियोजना की आधारशिला वर्ष 1977 में प्रारंभ हुई थी। जिसे केंद्र सरकार ने वर्ष 1994 में बंद कर दिया था। अब इस परियोजना को छत्तीसगढ़ सरकार सिंचाई सुविधा बढ़ाने के उद्देश्य से पुनः प्रारंभ करना चाहती है।

इस परियोजना का जल ग्रहण क्षेत्र 15 हजार 280 वर्ग किमी तथा अधिकतम जल भराव 466.8 मीटर होगा। इसके चलते बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिले की एक लाख 96 हजार 249 हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होगी।

इस परियोजना के निर्माण से 5704.322 हेक्टेयर वन भूमि, 5010.287 हेक्टेयर निजी भूमि, 3600.528 एकड़ सरकारी भूमि, कुल 13783.14 हेक्टेयर भूमि डुबान क्षेत्र मेंआएगी। जल भराव से 28 गांव पूरी तरह और 14 गांव आंशिक रूप से डुबान में आएंगे। वहीं 2448 परिवारों के 12 हजार 888 सदस्यों को विस्थापित किया जाएगा।

छह सौ साल पुरानी हैं बस्तियां

बिंता निवासी एक ग्रामीण बताते हैं कि लगभग 600 साल पहले तत्कालीन बस्तर महाराजा ने पापड़ाहांडी ओडिशा के राजा की गिरफ्त से 360 अरण्यक ब्राह्मणों को छुड़वाकर बिंता सहित विभिन्न गांव में बसाया था। कालांतर में यहां बस्तियां बढ़ती गईं और अब इस घाटी  में धान की भरपूर पैदावार हो रही है। घाटी में कुल 17 पंचायत और 42 गांव हैं। जो इंद्रावती के उत्तर और दक्षिण दिशा में बसे हैं|

नाराज हैं बाशिंदे

सतसपुर के सरपंच बताते हैं कि बोधघाट परियोजना के फिर से शुरू होने की जानकारी ग्रामीणों को समाचार पत्रों तथा व्हाट्सएप से  मिल रही है। बोधघाट परियोजना पहले ही रद्द कर दी गई है। उसे पुनर्जीवित करने की बात से ग्रामीण नाराज हैं और चार-चार पंचायतों के ग्रामीण क्रमबद्ध बैठकें कर अपना विरोध जता रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह परियोजना अब कैसी होगी, बाशिंदों का क्या होगा? यह बताने कोई जन प्रतिनिधि या सिंचाई, राजस्व विभाग का अधिकारी घाटी के गांवों में नहीं पहुंचा है|

 

चौतरफा विरोध

करेकोट, बिंता, सतसपुर, रायगोंदी के ग्रामीण बताते हैं कि लगभग 10 पीढ़ियों से वे घाटी में जीवन यापन करते आ रहे हैं अब यहां हर तरह की फसल ली जा रही है| यहां के 42 गांवों को डूबान क्षेत्र में रख आदिवासियों को विस्थापित करने की बात कही जा रही है अगर मजबूतीवश विस्थापित होते हैं तो नई भूमि को उपजाऊ बनाने में वर्षो लग जाएंगे, इसलिए परियोजना का विरोध कर रहे हैं।

इस दिशा में  नक्सलियों का विरोध भी जारी है। बिंताघाटी में 42 गांवों के जो ग्रामीण विरोध कर रहे हैं। उनके पीछे माओवादियों का भी हाथ है।ऐसा माना जा रहा है, परंतु ग्रामीण इस संदर्भ में खुलकर कुछ नहीं कह रहे हैं। ज्ञात हो कि नक्सली नेता पहले ही अपने पर्चों में बोधघाट परियोजना के विरोध में अपनी बातें रख चुके हैं।

पुनर्वास के लिए कहां है जमीन

बोधघाट परियोजना को लेकर बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता व पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री अरविंद नेताम का कहा है कि 40 साल पहले ही केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि बोधघाट परियोजना से सिंचाई संभव नहीं है| केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ही इसे बंद किया था और अब प्रदेश की कांग्रेस सरकार इसे पुनर्जीवित करना चाहती है। छग सरकार कहती है कि पुनर्वास पहले होगा। मैं इस बात से सहमत हूं। पुनर्वास से ही लोगों का विश्वास जीता जा सकता है।

सरकार का दावा उचित नहीं लगता, चूंकि क्षेत्र में इतनी राजस्व भूमि नहीं है और जो भूमि बची है उस पर अतिक्रमण हो चुका है। बस्तर के लिए पेसा, वन अधिकार, पुनर्वास और भूमि अधिकार कानून बनाया गया है। चूंकि पुनर्वास के लिए राजस्व भूमि नहीं है प्रदेश सरकार यदि केंद्र से वन भूमि रिलीज करवा सकती है, तभी विस्थापितों का पुनर्वास संभव है।

इधर ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे विरोध के चलते ग्राम सभाओं में परियोजना के लिए पक्ष में प्रस्ताव लेना भी कठिन है। उन्होंने कहा कि बोधघाट परियोजना को प्रारंभ करने राज्य सरकार जल्दबाजी न करें। विडंबना यह है कि अब तक इस परियोजना के लिए सर्वे भी नहीं किया गया है और सरकार अभी से तीन जिला के किसानों को सब्जबाग दिखा रही है|

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