भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी

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भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। परंपरा से नारी को शक्ति का रूप माना गया है, पर आम बोलचाल में उसे अबला कहा जाता है। भारतीय समाज में स्त्री की विरोधासपूर्ण स्थिति की अनुगूँज वैदिक ऋचाओं से प्रारंभ हो जाती है, जिसमें उसे कहीं अत्यंत श्रेष्ठ मानते हुए पूज्य बताया गया है, तो कहीं काम-वासना का मूर्त रूप मानते हुए मुक्ति-मार्ग में बाधक। भक्तिकालीन कवियों कबीर, दादू, तुलसी आदि के राज्य में भी स्त्री को लेकर यही अंतर्विरोध विद्यमान है।

-डॉ भवानी प्रधान

अब भी हमारे समाज और साहित्य में स्त्री के प्रति यह रवैया मौजूद है। हालांकि नारी अब अबला नहीं है। अब उसने निज शक्तियों को विकसित कर लिया है। अब हर कर्मक्षेत्र में समस्त सीमाओं को लाँघकर अपने बलबूते स्वयं की एक विश्व स्तरीय पहचान बना ली है।

‘नारी’ शब्द प्रकृति का स्वरूप है, देश  की ‘शक्ति-सापेक्ष है। नारी शब्द के विश्लेष्ण से स्पष्ट होता है कि नर की तरह ‘नृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है- क्रियाशील। अर्थात् जो गति करे, हलचल करे वह नर एवं नारी है, किंतु ऋग्वेद में ‘नृ’ का प्रयोग नेतृत्व करने, दान देने और वीरता दिखाने से है। इन तीनों  विशेषताओं को समान रूप से धारण करने वाला कहा गया है। भारतीय साहित्य में नारी के कार्यों, रूपों और स्थितियों के अनुसार अनेक नाम प्रचलित हैं। उनमें नारी के सभी स्वरूपों और विभिन्न पक्षों का उल्लेख किया गया है। नर धर्म से संबंधित होने के कारण उसे नारी की संज्ञा दी गई है। नारी नाम के कारण ही अनायास नर से उसका सापेक्ष संबंध जुड़ जाता है। इस प्रकार नारी शब्द स्वतः संपूर्ण  शक्ति, शालीनता, सौंदर्य, ममता आदि वे सभी तत्व समाहित हैं, जो पुरुष से संबंधित हैं। नारी के स्वरूप को समझने के लिए नारी की स्थिति का इतिहास जानना जरूरी है।

सृष्टि का यह सनातन सत्य है कि सभ्यता व संस्कृति के उद्भव से लेकर आज तक नारी और पुरुष के संबंधों से ही समाज के विकास की धारा प्रवाहित होती रही है। आदिकाल से लेकर आधुनिक कालीन साहित्य के विविध रूपों में पुरुष और नारी का चित्रण समान रूप से होता आ रहा है। मनुष्य को पूर्णता नारी और पुरुष दोनों से ही मिलती है। मानव-संस्कृति के सृजन और विकास का मुख्य कारण नारी ही है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति  राधाकृष्ण ने नारी की परिभाषा इस प्रकार देते हैं- ‘‘नारी मूलतः पुरुष  की शिक्षिका है, तब भी जब वह बच्चा होता है और तब भी जब वह वयस्क होता है। प्रेमचंद भी इसी मत को दोहराते हुए कहते हैं- पुरुष विकास-क्रम में नारी से पीछे है, जिस दिन वह पूर्ण विकास तक पहुँच जाएगा वह स्त्री हो जाएगा।’  नारी से ही पुरुष शक्तिमान रहा है।

 

प्रकृति का सुंदरतम उपहार नारी, ईश्वर की अद्वितीय कृति है। वह आदिकाल से सभ्यता-संस्कृति और साहित्य के साथ जुड़ी हुई है। शुभा वाजपेयी के अनुसार- ‘‘जननी के रूप में नारी सृष्टि का केंद्र है। वह धरिणी है, वह भरिणी है। परिवार के केंद्र के रूप में संस्कृति के लिए वही अवलंब व वृŸा धारण करती है।’’ महादेवी वर्मा समाज की पूर्णता के लिए स्त्री और पुरुष के आपसी सहयोग के आधार को मानती हैं। महादेवी वर्मा ने लिखा है- ‘‘नारी शून्य के समान पुरुष की ईकाई के साथ सब कुछ है, परंतु उससे रहित कुछ नहीं।  नारी परिवार का केंद्र-बिंदू है।

भारतीय समाज में नारी का स्थान पूजनीय एवं सम्माननीय है। सभ्यता तथा समाज के विकास में नारी का योगदान सर्वोपरि है। कभी वह ममतामयी माँ बनकर संतान का पालन-पोषण करती है, कभी वह बेटी बनकर घर-परिवार की ‘शोभा बढ़ाती है, तो कभी बहन बनकर भाइयों से दुलार करती है और वह अंत में दादी-नानी बनकर गौरवपूर्ण जीवन जीती है। भारत ही नहीं वरन् संपूर्ण विश्व में नारी का स्थान महत्वपूर्ण रहा है।

विगत कुछ दशकों से नारी-चिंतन या नारी-विमर्श से जुड़े हुए प्रश्न इक्कीसवीं सदी के सबसे ज्वलंत मुद्दे हैं। नारी-चिंतन आज एक ऐसा विषय है, जिसका प्रभाव साहित्य व समाज के साथ-साथ कला, संस्कृति, देश–दूनिया पर भी देखा जा सकता है। पहले पहल तो यह सिर्फ स्त्रियों तक सीमित रही, परंतु आज इसका असर पूरे विश्व में दिखाई दे रहा है। जब क्रांति आती है तो इसका प्रभाव सर्वप्रथम साहित्य और समाज पर पड़ता है। इस बदलाव को साहित्यकार संजीदगी से महसूस करता है और इसमें जीता है। इसलिए साहित्यकार अपने समय का सबसे पारखी व्यक्ति होता है।

नारी-चिंतन के विषय में विश्व -समुदाय के समक्ष स्त्री-जीवन के नए पहलू, उनकी विचारधारा, स्त्री-जीवन की समस्याएँ और उनकी जरूरतों को सामने रखकर उस पर नए सिरे से विचार-विमर्श प्रारंभ हुआ, जिसे स्त्री- विमर्श कहा गया। स्त्री- विमर्श से स्प”ट होता है कि स्त्री का दमन पितृसत्ता व्यवस्था से शुरू हो गया था। स्त्री- विमर्श के विषय में पुरुष -लेखकों तथा स्त्री-लेखिकाओं दोनों ने चिंतन करके अपनी लेखनी चलाई है। स्त्री- विमर्श पर लिंग, धर्म, परंपरा, विचार, विभिन्न स्थितियों पर विभिन्न लेखकों ने अपने मंतव्य प्रकट किए हैं।

क्रांतिकारी लेखिका तस्लीमा नसरिन के अनुसार-‘‘उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि धर्म का आश्रय लेकर नारियों को पतन के गर्त में धकेला जा रहा है। इसी आधार पर उनकी मान्यता है, स्त्री दलित है। स्त्री की कोई जाति नहीं होती, उसका कोई धर्म नहीं होता। वह सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु है। चूँकि धर्म में उसके इस्तेमाल का प्रावधान है इसलिए मैं नास्तिक पुरूषों के खिलाफ नहीं हूँ, किंतु धर्म अनुमोदित पुरुष -तंत्र के खिलाफ हूँ।

नारी- विमर्श, नारी-चिंतन आज के समय की माँग हैं नारी के संघर्ष  का स्वरूप बदला है। नारी शिक्षित होकर ‘शोषण और उत्पीड़न के विरूद्ध खड़ी होने की क्षमता रखती है। निस्संदेह आज नारी में जागरूकता आई है। वृंदा करात लिखती हैं- ‘‘नारीवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके दम पर महिला-मुक्ति का प्रयास किया जा रहा है। इसके अनेक रूप हैं, अलग-अलग प्रवृतियाँ हैं जिन्हें समय-समय पर अलग-अलग रूपों में परिभाषित किया जाता है। एक लक्ष्य सबके सामने है महिला होने के नाते उसका जो ‘शोषण किया जाता है, उसका मूल खोजा जाए और जड़ से उखाड़ फेंका जाए।

नारी के सहयोग, त्याग, ममता, समर्पण, सृजनशीलता के बिना संसार का गति-चक्र चल नहीं सकता फिर नारी को दूसरे दर्जे में स्थान दिया गया है। यह एक गंभीर तथा सोचने वाली समस्या है। नारी की उन्नति के बिना राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता।

स्त्री- विमर्श की प्रमुख आलोचक एवं कथाकार प्रभा खेतान की यह मान्यता है- ‘‘नारीवाद पारंपरिक ज्ञान और दर्शन को चुनौती देता है। ऐतिहासिक रूप में हम पुरुष प्रधान समाज में रहते आए हैं, जहाँ स्त्री ज्ञाता नहीं बल्कि ज्ञान की विषयवस्तु है, जिसे यथार्थपरक ज्ञान का वस्तुपरक ज्ञान कहते हैं। वास्तव में वह पुरूषों द्वारा निर्मित एवं उत्पादित ज्ञान हैं इसी ज्ञान को पुरुष ने समाज के केंद्र में अधिष्ठित किया। इसके विपरीत नारीवाद-सिद्धांत स्त्री केंद्रित ज्ञान की चर्चा करता है।

विनय कुमार पाठक के अनुसार- ‘‘लिंग के आधार पर अनूभूति को अलगाने वाला विवेचन ही स्त्री-विमर्श है। स्त्रियों की दशा भी दलितों जैसी दयनीय है। यही कारण है कि दलित- विमर्श  के समानांतर स्त्री- विमर्श पर आंदोलन की राह पर कदम-से-कदम मिलाकर बढ़ता रहा है।  नारी स्वयं की स्थिति के बारे में विचार करने लगी है, यही स्त्री- विमर्श है। इसका मूल-मंत्र आत्मसम्मान एवं आत्मनिर्भरता है।

स्त्री-अस्मिता की लड़ाई आधी दुनिया की लड़ाई है। प्रत्येक युग में स्त्री का आत्म-संघर्ष  अपनी निरंतरता में विद्यमान रहा है। चाहे आर्थिक, सामाजिक या राजनैतिक क्षेत्र हो। सभी क्षेत्रों में बराबरी का संघर्ष स्त्री-मुक्ति का संघर्ष है। आज नारी अपने अधिकार के बारे में सोचने और निर्णय लेने लगी है। वह बंधन-मुक्त भौतिक जीवन जीने की कोशिश कर रही है। नारी में शिक्षा के सर्वतोन्मुखी विकास के कारण नई चेतना जागृत हुई है, जिसके कारण रूढि़गत एवं परंपरागत मान्यताओं को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रही है। नारी का संघर्ष पुरुष के साथ द्वंद्वात्मक स्थिति रखने में नहीं बल्कि पुरुष  सत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने में है।

(लेखिका हिंदी की व्याख्याता हैं , उन्होंने नारी विमर्श पर केन्द्रित अपने शोध में विभिन्न पहलुओं को सामने रखा है|  पीएचडी शोध का सम्पादित एक अंश )

 

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