सदा जवान बूढ़ापारा, मराठों से जुड़ा हुआ है इतिहास

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बूढ़ापारा, सदर और गोलबाजार

 

रायपुर शहर के बीचोंबीच स्थित बूढ़ापारा, सदर बाजार और गोलबाजार को रायपुर की धड़कन कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन मोहल्ले में से सबसे पुराना मोहल्ला बूढ़ापारा को माना जाता है। नागपुर के मराठा शासक रघुजी भोंसले के सेनापति भास्कर पंत ने साल 1741 में रतनपुर और रायपुर में आक्रमण कर छत्तीसगढ़ में कल्चुरी राजवंश के शासन को समाप्त कर मराठा राजवंश को स्थापित किया था। तब रघुजी ने अपने पुत्र राजकुमार बिम्बाजी को छत्तीसगढ़ का राजा बनाया था। भास्कर पंत के आक्रमण के समय रायपुर में अमर सिंह का शासन था।

रायपुर में अपनी सत्ता की पकड़ और जरूरतों को पूरा करने के लिए मराठों ने कई मोहल्ले बसाए थे। उनमें से तात्यापारा, बूढ़ापारा, भोई पारा, तेली पारा, कमासी पारा, लखेर ओली आदि मोहल्ले आज भी मौजूद हैं। बूढ़ापारा उसी जमाने का लगभग पौने तीन सौ साल पुराना मोहल्ला है। इस मोहल्ले की नाम बूढ़ापारा सम्भवतः इसी के बगल में स्थित बूढ़ातालाब के कारण ही प्रसिद्ध हुआ होगा । इस तालाब के उस पार पुरानी बसाहट बस चुकी थी। जिसे वर्तमान में पुरानी बस्ती और ब्राह्मण पारा कहा जाता है। इस मोहल्ले की पहचान मराठे मतलब क्षत्रियों के गढ़ के रूप में है। किन्तु महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण भी यहां बड़ी संख्या में निवासरत हैं। यहां के मराठों का मराठा मित्र मंडल नामक 100 साल पुरानी संगठन भी है। दूसरे समाज के लोग भी यहां बड़ी संख्या में निवासरत हैं।

( फेसबुक पर सक्रिय अजय कुमार वर्मा ने पत्रकारिता से करियर शुरू किया, इन दिनों वे नगरनिगम रायपुर में कार्यरत हैं उनका रायपुर पर #सन्डे_की_चकल्लस काफी चर्चित है )

बूढ़ापारा के बाद सदर बाजार, सत्ती बाजार नयापारा, रहमानिया चौक, लखेर ओली, तेली पारा, कमासी पारा, कलाई पारा, दशरथ पारा आदि मोहल्ले बसते गए। इन्हीं के साथ ही यहां व्यवसायिक गतिविधियां भी शुरू हो गई।

कोतवाली चौक के पास लगभग दो दशक पहले तक एक फौव्वारा लगा था। इसमें दो बच्चों की मूर्तियां थीं। ये फौव्वारा यहां कब लगाया गया, ये किसी को भी पता नहीं है। यहां के साठ सत्तर साल से भी अधिक बुजुर्ग भी कहते हैं कि वे उसे बचपन से ही उसे देख रहे हैं। उस फौवारे को बाद में मोतीबाग में शिफ्ट कर दिया गया। उसकी जगह यहां भगवान महावीर को समर्पित एक स्तूप बनाया गया। जिसे कुछ समय पहले ही सड़क चौड़ीकरण के चलते हटा दिया गया। इस क्षेत्र में उस फौवारे के अलावा दो ओर फौवारे थे।

सत्ती बाजार में सिर पर घड़ा रखकर नृत्य करती अप्सरा वाला फौवारा लगा था। तीसरा फौवारा नवदुर्गा चौक नयापारा में था। वह गोल आकार का फौवारा था। वहां भी अब फौवारा नहीं है। किंतु उस चौक को फौवारा चौक के नाम से ही जाना जाता है।छाया – साभार गोकुल सोनी

 

 

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