क्या भारतीय लोकतंत्र की यह असली तस्वीर है ?

’इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने 2023 के लिए देश के सौ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभावशाली हस्तियों की एक सूची जारी की है.  इस सूची में राजनीतिक पृष्ठभूमि के ताकतवर हस्तियों की संख्या सर्वाधिक है. चुनिंदा उद्योगपति, नौकरशाह, फिल्मी हस्ती, पूंजीपति एवं चिकित्सक पेशेवर के लोग भी इस सूची में हैं, लेकिन अकादमिक जगत के लोगों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि को इस सूची में स्थान नहीं मिला है.  इसमें कोई ताज्जुब वाली बात नहीं है, मगर सवाल एवं विमर्श खड़ा होता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र की यह असली तस्वीर है ?

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’इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने 2023 के लिए देश के सौ सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभावशाली हस्तियों की एक सूची जारी की है.  इस सूची में राजनीतिक पृष्ठभूमि के ताकतवर हस्तियों की संख्या सर्वाधिक है. चुनिंदा उद्योगपति, नौकरशाह, फिल्मी हस्ती, पूंजीपति एवं चिकित्सक पेशेवर के लोग भी इस सूची में हैं, लेकिन अकादमिक जगत के लोगों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि को इस सूची में स्थान नहीं मिला है.  इसमें कोई ताज्जुब वाली बात नहीं है, मगर सवाल एवं विमर्श खड़ा होता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र की यह असली तस्वीर है ?

स्वाभाविक है इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री जयशंकर एक से तीन नंबर पर हैं. सूची में चार नंबर पर चीफ जस्टिस चंद्रचूड़, पांच नंबर पर योगी आदित्यनाथ और छह नंबर पर मोहन भागवत हैं.  सात नंबर पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, आठ नंबर पर निर्मला सीतारमण, नौ नंबर पर मुकेश अंबानी, 10 नंबर पर अजीत डोभाल, 11 नंबर पर राजनाथ सिंह, 12 नंबर पर बी एल संतोष हैं. इसके बाद 13 नंबर पर ममता बनर्जी, 14 नंबर पर नीतीश कुमार और 15 नंबर पर राहुल गांधी और 16 नंबर पर अरविंद केजरीवाल हैं.

इस सूची में नीता अंबानी भी हैं और आलिया भट्ट भी हैं. दिलचस्प यह भी है कि कोई भी साहित्यिक, अकादमिक या संगीत की दुनिया का आदमी इस सूची में नहीं है.

सूची लंबी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि जो पावर है, जो रूतबा है, जो प्रभाव है, वह राजनीति के कारण है, सत्ता के कारण है. इस सूची से यह स्पष्ट है कि सत्ता और पूंजी का जोड़ या गठजोड़ हो तो ही आप सूची में होंगे, वरना आप आउट ऑफ लिस्ट है.। इस सूची में नीता अंबानी भी हैं और आलिया भट्ट भी हैं. दिलचस्प यह भी है कि कोई भी साहित्यिक, अकादमिक या संगीत की दुनिया का आदमी इस सूची में नहीं है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष एम जगदीश कुमार इस सूची में हैं, लेकिन निश्चित रूप से अकादमिक होने के कारण नहीं अपितु दीगर कारणों से इस सूची में हैं.

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फिल्म पठान के भारी विरोध से उत्पन्न सफलता के कारण फिल्म जगत से शाहरुख 50वें नंबर पर हैं और अमिताभ बच्चन 87वें नंबर पर हैं.  100वें पर फिल्म अभिनेता रणवीर सिंह हैं.  राजनेता, कानून जगत के लोग, पूंजीपति और यहां तक कि अपोलो अस्पताल के मालिक भी इस सूची में हैं.  मगर देश का कोई जानामाना पत्रकार, लेखक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, अकादमिक, अविष्कारक ’सत्ता के खेल से उत्पन्न कॉमन सेंस से निकली हुई इस सूची’ में नहीं है.

विमर्श खड़ा होना चाहिए कि क्या यह सूची देश की असली तस्वीर प्रस्तुत करती है ? क्या लोकतंत्र इसी तरह के प्रभावशाली हस्तियों से चलता है ? क्या लोकतंत्र इसी तरह के लोगों की बदौलत महान और महिमामंडित होता है ? क्या इसी तरह के प्रभावशाली हस्तियों से देश चलता है ? सबसे बड़ा मूल विमर्श यह है कि क्या सिर्फ वोट की राजनीति को प्रभावित करने वाले हस्तियों को ही लोकतंत्र का असली प्रहरी या पहरेदार माना जाना चाहिए ? यदि इस तरह की सच्चाई लोकतंत्र की असली हकीकत है ? तो यकीन मानिए इस तरह का लोकतंत्र कभी भी असली लोकतंत्र नहीं हो सकता है.

-डॉ. लखन चौधरी

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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