कपट, छल, तथा प्रपंच से देवता भी मुक्त नहीं

कपट, छल, तथा प्रपंच से देवता भी मुक्त नहीं | देव भी अपनी प्रभुता की अखंडता को बनाये रखने के लिए वे भी छल, कपट तथा प्रपंच से मुक्त नहीं हो पाते। देवों के प्रमुख होकर भी इंद्र ने  गौतम ऋषि का छद्मवेश धारण किया तथा अहिल्या के साथ बलात्कार किया।

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कपट, छल, तथा प्रपंच से देवता भी मुक्त नहीं | देव भी अपनी प्रभुता की अखंडता को बनाये रखने के लिए वे भीछल, कपट तथा प्रपंच से मुक्त नहीं हो पाते। देवों के प्रमुख होकर भी इंद्र ने  गौतम ऋषि का छद्मवेश धारण किया तथा अहिल्या के साथ बलात्कार किया। क्या यह इस बात प्रमाण नहीं है कि कपट के विरूद्ध देवताओं का मानस भी दृढ़ नहीं है।

कपट: छल, कपट, कुट-रचना तथा कपट भाव की दृष्टि से एक ही कुनबे के हैं। मनोभावों एवं विकारों में कपट अधम श्रेणी में आता है क्योंकि स्वांग भरने की कला में यह अत्यंत प्रवीण होता है। प्रत्यक्ष रूप में यह कभी भी दृश्य प्रतीत नहीं होता जैसे कि अन्य विकार यथा काम, क्रोध, लोभ आदि अपने स्वाभाविक रूप में व्यक्ति में दिखाई दे जाते हैं किंतु कपट उस मीठे कैप्सूल की तरह होता है जिसके अंदर दाहक विष भरा होता है तथा सेवन के पश्चात् ही इसके अस्तित्व का आभास होता है। इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि यह एक हीन विकार है।

कपट व्यक्ति के मानस को ही नहीं अपित उसके अंतस को भी दूषित करता है तथा कामना-प्राप्ति के लिए यह व्यक्ति को किसी भी सीमा तक पतित कर सकता है। इसका वेग इतना प्रबल होता है कि विवेक या अन्तर्प्रज्ञा भी अपनी महत्ता खो देते हैं।

व्यक्ति व्यक्ति के मध्य हो या राष्ट्र राष्ट्र के मध्य युद्ध अब अर्थ-हीन हो गया है। कूट-रचना ही सर्वोपरि हो गया है। कपट शब्द अब इस विकास के दौर में अब कूट-नीति कहा जाने लगा है। व्यक्ति, व्यक्ति के मामले में छल, प्रपंच अब कपट न कहा जाकर कूट-रचना कही जाने लगी है।

pics : facebook.com/mrityunjay.mishra.142

पहले किसी को कपटी कह देने मात्र से उत्तेजित होकर भड़क जाता था। इसे वह अपने प्रति एक गाली की तरह अनुभव करता था, अब कपटी न कहकर एक कुशल कूटनीतिज्ञ कह दो, वह हर्षित होकर आपके प्रति अनुग्रहित हो जाएगा। आशय, यह है कि कपट ने आज चोला बदल दिया है। कभी कपट का अर्थ धोखा, फरेब, बेईमानी तथा दगाबाजी से था आज कपट ने इस अर्थों को अपने हित में सकारा मक रूप से बदल लिया है।

वैसे कपट का अर्थ अत्यंत व्यापक है। एक व्यक्ति का एक व्यक्ति को धोखा देना, छलना या उसके प्रति विश्वास घात करना ही कपट नहीं है उसे मति-भ्रम करना, तथा संशययुक्त सफलता का झांसा देकर अपना हित साधना भी कपट है। 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ। ‘फूट डालो और राज करो’ के कपट कूटनीति का प्रयोग करते आजादी के साथ भारत को विभाजन का अभिशाप भी मिला। पाकिस्तान अंग्रेजों के कपट की उपज ही तो है जिसको देश भारत अब भी भुगत रहा है।

कपट अपनी चाल की सफलता के लिए उन विश्वास का सहारा लेता है। संवेदना, मूल्य, कर्तव्य तथा सहयोग जैसे प्रभावी भावों को प्रत्यक्ष आड़ में रखता है तथा तनिक भी अहसास नहीं होने देता कि उसकी भावनाएं दूषित हैं या इसमें उसका कोई स्वार्थ छिपा है। वह तात्कालिक लाभ के लोभ को भी पूरी गंभीरता से संवरण करता है तथा अवसर की प्रतीक्षा करता है एवं जैसे ही अवसर प्राप्त होता है, व्यक्ति व्यक्ति के या राष्ट्र, राष्ट्र की पीठ पर छूरी भोंप देता है।

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कपट के पांव नहीं होते तथा वह विश्वासघात, अवसरवादिता, स्वार्थ, छल, प्रपंच की बैखाखी के सहारे चलता है। अन्तस (हृदय) तथा मानस की कोमल भावनाएं उसके लिए कोई मूल्य नहीं रखते। वस्तुत: कस्ट शाश्वत मनोभावों को विकृत इस सीमा तक कर देता है कि व्यक्ति के लिए प्राप्ति या निजत्व की सफलता ही सर्वोपरि हो जाती है तथा नैतिक व मानवीय मूल्य गौण कपट में कूट-रचना तो होती ही है किंतु व्यक्ति या राष्ट्र इसका प्रयोग बहुत बड़े स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते हैं किंतु व्यक्ति का विवेक जब इसके प्रभाव से ” निष्प्रभावी हो जाता है या तम का भाव बढ़ जाता है तब समस्त विकार भी कपट के साथ हो लेते हैं।

कहा गया है ‘विकारों के प्रति कपट में चुम्बकीय आकर्षण होता है अतः व्यक्ति बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के कपट में विकारों को शामिल कर लेता है। तथा कपट को कुटिलता में बदलने में समर्थ हो जाता है। कुटिलता कपट का अत्यंत घिनौना रूप है। व्यक्ति जब किसी के प्रति कुटिलता का परिचय देता है तो वह हैवानियत की सभी हदों को पार कर लेता है। उसमें इंसानियत होती ही नहीं तथा क्रूर पर-पीड़क की तरह वह व्यवहार करने लगता है। वह अपने ही अन्तस को मार डालता है तथा विवेक को शून्य कर लेता है।

आज के भौतिकवादी युग में व्यक्तियों के मध्य सुविधा तथा कामना पूर्ति के लिए गला काट प्रतिस्पर्धा चलने लगी है। प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से आगे बढ़ जाना चाहता है। इस बढ़ने की प्रवृत्ति ने उसे बदलकर रख दिया है। व्यक्ति ने अपने वजूद को ही छिपा लिया है। उसने नकाब ओढ़ रखा है। वास्तव में वह नहीं रह गया है जो है, उसका छद्म रूप ही सामने है जिसे पहचान पाना भी संभव नहीं है।

इतना ही नहीं उसने छद्म रूप के अनुसार अपना आचरण भी बना लिया है और यदि आचरण ही बदल गया है तो मानी हुई बात है कि उसका कर्म, मन और वचन भी तदानुसार ही होगा। व्यक्ति का यह छद्म रूप ही तो कपट है। छल तथा प्रपंच के दांवपेंच में वह इतना माहिर हो गया है कि उसका यह स्वांग भी सत्य ही प्रतीत होता है ऐसे जैसे पीतल ने सोने की चमक हड़प ली हो।

छत्तीसगढ़ में एक अत्यंत प्रेरक धारणा है कि कोई यूं ही बड़ा नहीं बन जाता। बड़ा बनने के लिए यंत्रणाओं की प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है। दाल को रात भर पानी में भिगोना पड़ता है। सुबह उसे पीसा जाता है। फिर कड़ाही के खौलते तेल में उसे आकार देकर डाला जाता है फिर पकने पर उसे छाना जाता है, तब वह बड़ा कहलाता है।

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‘बड़ी’ का क्या, भिगोया, पीसा और सूखा दिया। इस ‘बड़ा’ का दर्शन त्याग, कपट, परिपक्वता तथा समर्पण से परिपूर्ण है। किंतु इन अर्थों में आज कोई बड़ा नहीं बनना चाहता। न उसे भीगना, न पीसना, न खोलते तेल में से होकर गुजरना स्वीकार्य है। त्याग और आत्माहूति की कल्पना करना भी बेमानी है। वह तो छल, प्रपंच तथा कूट-रचना से बड़ी होकर ही बड़ा कहलाना चाहता है।

स्वार्थ के अतिरिक्त विषाक्त मानसिकता को लेकर किसी व्यक्ति के विरूद्ध षड़यंत्र भी कपट है। यह षडयंत्र ही तो कूट रचना है जिसमें व्यक्ति कुशल नट की तरह व्यक्ति को भ्रमित कर या झांसा देकर अपने हितों की पूर्ति करता है। कुटिल कुशल भाट भी होता है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इस प्रकार शब्द जाल बुनता है कि शिकार (व्यक्ति) उसे ही सत्य मानकर उलझ कर रह जाता है।

प्रशंसा भी तो एक अमोघ शस्त्र है जिसका वार शायद ही कभी खाली जाता हो। प्रशंसा अर्थात् स्तुति तो ईश्वर को भी प्रिय होती है। दुश्मन भी स्तुति से व्यक्ति के प्रति प्रियः भाव रखने लगता है। हकीकत तो यही है कि व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी आत्म-स्तुति सुनना है। व्यक्ति जानता है। समझता है कि वह ऐसा नहीं है जैसा बताया जा रहा है किंतु टोकता नहीं प्रसन्न होता है तथा सहज ही स्तुति के शब्द जाल में स्वयं को डाल लेता है एवं कूट रचना का शिकार हो जाता है।

राजनीति के क्षेत्र में ही नहीं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छद्म स्तुति का कपट सर्वाधिक सफल है। जो इस कला में जितना पारंगत होगा, वह उतना अधिक सफल रहेगा। राजनीति में तो इसे एक प्रभावकारी गुण माना गया है तथा कपट कला में जो जितना निष्णात होगा उतना ही सफल नेतृत्व के उपयुक्त माना जावेगा।

मनु स्मृति में कपट को निम्न कोटि का मानसिक अपराध माना गया है तथा ऐसा करने वाले को धार्मिक-पाप करने वालों की श्रेणी में रखा गया है।

लोभ: जब कामना या आसक्ति लोभ नहीं मानी गई

पूरा विश्व इतिहास, राजनैतिक, आर्थिक, आध्यात्मिक या वैज्ञानिक, कपट, कूट रचना छल तथा प्रपंच से भरा पड़ा है।आध्यात्मिक ग्रंथों यथा रामायण, गीता, हरिवंश पुराण, शिवपुराण, कार्तिक पुराण में कपट को हीन तथा घृणित विकार तो स्वीकार किया गया है किंतु इन्हीं ग्रंथों में कपट के अनेकानेक उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं।

अन्य धर्मों के ग्रंथों ने भी इसे स्वीकार किया है कि छल, प्रपंच तथा कपट ईमान के लिए कदापि उचित नहीं है यह ख़ुदा को पसंद नहीं है। ईसाईयत में भी छल, कपट तथा प्रपंच को हिकारत की नजर से देखा गया है तथा माना गया है कि परमेश्वर कूटरचना, छल तथा कपट को क्षमा नहीं करते किंतु सर्वाधिक दुखद पहलू तो यह है कि सभी धर्मों में इसकी आलोचना के परे फरेब, धोखा, तथा कपट के दृष्टांत भरे पड़े हैं।

मानस मर्मज्ञ दिनेश दीक्षित का मत है ‘देवत्व को श्रेष्ठता का मापदंड माना जाता है किंतु कतिपय आध्यात्मिक उदाहरणों की मीमांसा से प्रतीत होता है कि अपनी प्रभुता की अखंडता को बनाये रखने के लिए वे भी छल, कपट तथा प्रपंच से मुक्त नहीं हो पाते।’

सामान्य व्यक्ति पतनोन्मुख होकर या विकार ग्रस्त मानसिकता के साथ जिस प्रकार का आचरण करता है, वैसा ही कुछ तो देव भी करते हैं। मनुष्य तो जीवन काल में सदैव मृत्यु को लेकर सशंकित रहता है। उसके अवचेतन में इसी से संबंधित कुंठा भी रहती है किंतु देव तो अमरत्व को प्राप्त है। तथापि उनमें कूट रचना, कुटिलता या स्वार्थ सिद्धि की कामना, समझ के परे है।

देवों के प्रमुख होकर भी इंद्र ने कामदेव के साथ मिलकर निर्दोष, साध्वी गौतम पत्नी अहिल्या को भोगने के लिए. कूट रचना की। इंद्र ने गौतम ऋषि का छद्मवेश धारण किया तथा अहिल्या के साथ बलात्कार किया। क्या यह इस बात प्रमाण नहीं है कि कपट के विरूद्ध देवताओं का मानस भी दृढ़ नहीं है।

अहिल्या का प्रकरण मन को हिलाकर रख देता है तथा देवराज इंद्र के देवत्व को भी प्रश्न के दायरे में ला खड़ा करता है कि सामान्य काम, क्रोध, लोभ तथा मोह को विजित न कर कपट / कूटरचना करने वाला भला देव-राज कैसे हो सकता है? सामान्य जन के मानस को उनका देवत्व भला कहां अनुप्राणित कर सकता है।

लंकाधिपति रावण महापंडित, वेद-वेत्ता, चिंतक तथा अनन्य शिवभक्त विप्रथा वह महान ज्ञानी तथा ऋषि पुलत्स्य का पोता था। उसने भी मारीच को माध्यम बनाया कपट का तथा उसे विवश किया कि माया-मृग का रूप धारण करता करें। रावण ने ऐसा कपट, छल किया साधुवेश धारण कर तथा पंचवटी में अकेली सीता का हरण करने में सफल रहा। यद्यपि इसे भगवान श्रीराम की ही लीला कहा गया है |

स्पष्ट है कि कपट एक क्रूर कर्म है। यह अन्तस की संवेदना को समाप्त तथा विवेक को जड़ कर देता है। व्यक्ति भावनात्मक रूप से पतित हो जाता है। सभी संतभाव यथा- दया, क्षमा, उपकार, संवेदनशीलता तथा मूल्यों के प्रति आदर, आदि कपट द्वारा दमित हो जाते हैं।

 

छत्तीसगढ़ के पिथौरा जैसे कस्बे  में पले-बढ़े ,रह रहे लेखक शिव शंकर पटनायक मूलतःउड़ियाभासी होते हुए भी हिन्दी की बहुमूल्य सेवा कर रहे हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा  निबंध  लेखन में आपने कीर्तिमान स्थापित किया है। आपके कथा साहित्य पर अनेक अनुसंधान हो चुके हैं तथा अनेक अध्येता अनुसंधानरत हैं। ‘ निबंध संग्रह भाव चिंतन  के  निबंधों का अंश  deshdigital  उनकी अनुमति से प्रकाशित कर रहा है |

 

 

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