बांग्लादेश ने दिया भारत को तगड़ा झटका

पड़ोसी देश बांग्लादेश प्रतिव्यक्ति आय एवं विकास दर के मामले में भारत से आगे निकल गया है। बांग्लादेश ने प्रतिव्यक्ति आय के मामले में तगड़ा झटका देकर सिद्ध कर दिया है कि विकास के लिए जाति-धर्म एवं हिन्दुत्व की राजनीति भारत को अब भारी पड़ने लगी है।

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पड़ोसी देश बांग्लादेश प्रतिव्यक्ति आय एवं विकास दर के मामले में भारत से आगे निकल गया है। बांग्लादेश ने प्रतिव्यक्ति आय के मामले में तगड़ा झटका देकर सिद्ध कर दिया है कि विकास के लिए जाति-धर्म एवं हिन्दुत्व की राजनीति भारत को अब भारी पड़ने लगी है।

-डा. लखन चौधरी

बांग्लादेश ने वित्त वर्ष 2020-2021 में अपने पड़ोसी देश भारत के मुकाबले ज्यादा तरक्की की है। इस वक्त बांग्लादेश की प्रतिव्यक्ति आय 2,064 डॉलर से बढ़कर 2,227 डॉलर हो गई है। बांग्लादेश की प्रतिव्यक्ति आय अब भारत की प्रतिव्यक्ति आय 1947 डॉलर से 280 डालर अधिक हो गई है। इस दृष्टि से बांग्लादेश की विकास दर 9 प्रतिशत बैठती है, जो दक्षेस देशों  में मालदीव के बाद सबसे अधिक है।

अध्ययन बताते हैं कि 2007 में बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भारत की तुलना में आधी थी, और अब भारत की तुलना में लगभग 500 डॉलर तक अधिक है। बांग्लादेश वासियों के लिए खुशी की बात यह है कि अब वे पाकिस्तान को इस मामले में बहुत दूर पछाड़ चुके हैं। इसे सन 1971 में हुए मानवसंहार के एक बदले के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें तीस लाख बंगाली मार दिए गए थे, और साथ ही पाकिस्तान की सेना द्वारा लाखों महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार भी किया गया था। इस दौरान पाक सेना द्वारा बांग्ला मुक्ति युद्ध को दबाया जा रहा था।

प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा है कि ’उनके पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान ने 1971 में पाकिस्तान से अलग होने का सही फैसला लिया, जिसका परिणाम सबके सामने है।’

प्रति व्यक्ति आय किसी देश, राज्य, नगर या अन्य क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आय होती है। इसका अनुमान उस क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों की आय के जोड़ को क्षेत्र की कुल जनसंख्या से विभाजित कर के लगाया जाता है। प्रति व्यक्ति आय विभिन्न देशों के अलग-अलग जीवन स्तर का एक महत्वपूर्ण सूचकांक होती है। यह मानव विकास सूचकांक में सम्मिलित तीन में से एक है।

अनौपचारिक या समान्य बोलचाल की भाषा में प्रति व्यक्ति आय को औसत आय भी कहा जाता है, और आमतौर पर अगर एक राष्ट्र की औसत आय किसी दूसरे राष्ट्र से अधिक हो, तो पहला राष्ट्र दूसरे से अधिक समृद्ध और सम्पन्न माना जाता है।

इस लिहाज से हमारे पड़ोसी देश मालदीव, श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश हमसे अधिक संवृद्ध एवं सम्पन्न हो गये हैं। उल्लेखनीय है कि कोरोना के पहले विगत पांच-छह सालों से ही भारतीयों की आय में कमी आ रही थी, इस महामारी ने तो सिर्फ स्थिति को और बदतर किया है।

देश  में आयकर रिटर्न जमा करने संबंधी आंकड़ों के संकेतों से भी साफ है कि आर्थिक सुस्ती और उसके बाद आई महामारी ने 2019-20 में करदाताओं की व्यक्तिगत आय पर भी गहरी चोट की है। आयकर विभाग की ई-फाइलिंग वेबसाइट में दर्ज 2020-21 के आंकड़ों के अनुसार 5 लाख रुपये सालाना से अधिक की आय वाले सभी श्रेणियों में आयकर रिटर्न में गिरावट आई है। जिनकी आय 50 लाख रुपये से एक करोड़ है, ऐसे करदाताओं की संख्या में करीब 21 प्रतिशत की गिरावट आई है।

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एक करोड़ से अधिक की आय घोषित करने वाले करदाताओं की संख्या में 23 प्रतिशत की कमी आई है। 20 लाख रुपये से 50 लाख रुपये के बीच आय दर्शाने वाले आयकरदाताओं की संख्या में 8 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। आयकर रिटर्न के मामले में 10 लाख रुपये से 20 लाख रुपये वाले आय वर्ग और 5 लाख से 10 लाख रुपये के बीच वाले आयकर वर्ग में गिरावट क्रमशः 2 प्रतिशत और 5 प्रतिशत है। 5 लाख रुपये तक की आय घोषित कर टैक्स रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में 15 प्रतिशत की भारी वृद्धि से पता चलता है कि तमाम वर्ग के करदाता फिसलकर निम्न आय वर्ग में आ रहे हैं।

इसका मुख्य कारण सरकार की अव्यावहारिक कर नीतियां हैं। मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है तब से आम जनता पर करों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि लोग अपनी छोटी-छोटी बचतों को भी रोजमर्रा के उपभोग के लिए खर्च करने लगे हैं। उपर से महंगाई की मार ने आमजन की कमर तोड़ कर रख दी है।

देश में कोरोना कालखण्ड में जिस तरह से मेडिकल एवं अन्य खर्चे तथा महंगाई बढ़ी एवं लगातार बढ़ रही है वह अत्यंत ही दुर्भाग्य जनक है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को लेकर देश  में हाहाकार मचा है लेकिन सरकार अपनी फिजुलखर्ची पर लगाम लगाने के बजाय मतदाताओं की जेब काटने में लगी है।

देश में रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं मगर लोगों की दैनिक खर्चे बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे में अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब होनी ही है। लोगों की आमदनी घटने से विकासदर, प्रतिव्यक्ति आय सब कुछ गिरने लगा है। केवल बांग्लादेश ही नहीं बल्कि दक्षेस देशों के मालदीव, श्रीलंका, भूटान भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से आगे निकल चुके हैं।

सवाल उठता है कि आखिर भारत लगातार क्यों इस तरह मात खाता जा रहा है ? भारत की विकास दर क्यों नहीं बढ़ पा रही है ? स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग-व्यापार हर मोर्चे पर भारत अपेक्षा अनुरूप प्रदर्षन करने में पिछड़ता क्यों जा रहा है ? जबकि देश में प्राकृतिक एवं मानवीय साधनों, संसाधनों की कहीं कोई कमी नहीं है।

इन प्रश्नों  का एकमात्र उत्तर यह है कि मोदी सरकार की प्राथमिकता से विकास एवं जनकल्याण का मुद्दा गायब है। सरकार सिर्फ चुनावी मशीन बनकर रह गई है। देश में जांत-पांत एवं हिंदुत्व की राजनीति ने आमजन को ऐसा तगड़ा झटका दिया है, जिसकी कीमत दशकों तक चुकानी पड़ेगी।

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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