आत्महत्या का अमरबेल: विवेचना एवं पड़ताल की दरकार

पिछले कुछ महिनों से खुदकुशी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। आत्महत्या का अमरबेल इस तरह फ़ैल रहा कि पढ़े-लिखे समझदार लोग भी जीवन की चिंताओं, हताशाओं, निराशाओं एवं कुण्ठाओं के चपेट में आकर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठा रहे हैं।

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उच्च शिक्षा सेवा में पिछले तीन-चार सालों से लगातार बढ़ते दबाव एवं तनाव की मुख्य वजह राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की कार्यशैली एवं कार्यसंस्कृति है। राज्य के तमाम अन्य विभागों की तरह इस विभाग में भी नौकरशाही हावी है, जिसके चलते अनेकों गैर-जरूरी निर्णय लिये जा रहे हैं। उच्च शिक्षा विभाग के निर्णयों में महाविद्यालयों के प्राचार्यों एवं प्राध्यापकों की अनदेखी करते हुए तमाम महत्वपूर्णं निर्णय मंत्रालयों, सचिवालयों एवं विश्वविद्यालय स्तर पर लिये जा रहे हैं, और इन निर्णयों को महाविद्यालयों पर दबावपूर्वक थोपा जा रहा है।

-डॉ. लखन चौधरी

पिछले कुछ महिनों से खुदकुशी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। पढ़े-लिखे समझदार लोग भी जीवन की चिंताओं, हताशाओं, निराशाओं एवं कुण्ठाओं के चपेट में आकर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठा रहे हैं। इसकी एक प्रमुख वजह कोरोना की भयावहता या विभिषिका को माना जा रहा है।

कोरोना कालखण्ड की पीड़ा, तीसरी लहर आने की आशंकाएं और रोज-रोज नये वेरिएंट के आने की खबरें लोगों को अब भी परेशान कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिन लोगों को कोरोना की दूसरी लहर ने परेशान किया था, उन पर अवसाद के अधिक लक्षण सामने आ रहे हैं, और इन लोगों में खुदकुशी जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।

इस कड़ी में विगत दिनों राज्य के एक शासकीय महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राचार्य ने अपने ही महाविद्यालय के साथी प्राध्यापकों की कथित प्रताड़ना संबंधी सुसाइड नोट छोड़कर आत्महत्या कर ली है। उच्च शिक्षा सेवा से जुड़े लोगों की यह पहली आत्महत्या नहीं है। इसके पूर्व भी राज्य में इस तरह की कई घटनाएं हुईं हैं, लेकिन उसकी वजह इस बार की तरह नहीं रही हैं।

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व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्याएं एवं चिंताएं उसकी वजहें रही हैं। इस बार इस आत्महत्या की स्पष्ट वजहें सार्वजनिक हो चुकी हैं, और साफ तौर से यह मामला अपने ही सहयोगी साथियों द्वारा असहयोग एवं मानसिक प्रताड़ना का है, जो बेहद दुखद एवं दुर्भग्यपूर्णं तो है, साथ ही साथ बेहद संवेदनशील भी है।

महाविद्याालय के प्राचार्य की खुदकुशी के बारे में जिस तरह से मामले उजागर हो रहे हैं, उससे साफ है कि प्राचार्य को उनके ही महाविद्यालय एवं विभाग के साथी प्राध्यापकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों का महाविद्यालय संचालन में साथ एवं सहयोग नहीं मिला जिसकी वजह से उन्हें तमाम तरह के दबाव एवं तनाव झेलने के लिए विवश होना पड़ा। लिहाजा महाविद्याालय चलाने का दबाव एवं तनाव इतना बढ़ता गया कि उन्हें अंततः आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

निश्चित तौर पर यह बहुत दुखद और दुर्भाग्यपूर्णं घटना है। सोचने वाली बात है कि ऐसे कौन-कौन से दबाव एवं तनाव रहे हैं जो उनको आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ा ? ऐसी कौन-कौन सी मजबूरी रही है जो एक क्लास वन अधिकारी के लिए आत्महत्या का कारण बनी ?

वे कौन सी स्थितियां या परिस्थितियां रही हैं जो प्राचार्य पद पर बैठे व्यक्ति तक को इस कदर लाचार एवं विवश होकर खुदकुशी जैसे कदम उठाना पड़ा ? जबकि उनके समक्ष कई तरह के विकल्प थे, जैसे: वे प्राचार्य का पद छोड़ सकते थे ? दूसरे महाविद्यालय में अपना ट्रांसफर करा सकते थे ? जिन व्यक्तियों से परेशान थे, उनकी उपर शिकायत कर सकते थे ?

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सुसाइड नोट में जिन लोगों पर आरोप लगाये गये हैं, उनके नाम सार्वजनिक करते हुए विभागीय स्तर के उच्च अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रख सकते थे, लेकिन उन्होनें खुदकुशी का रास्ता अख्तियार किया। जबकि उनका छोटा, सुखी, सम्पन्न एवं खुशहाल परिवार था।

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सवाल उठता है कि वह कौन सी वजह थी, जिससे वे इतने आहत हुए कि अपनी जिंदगी को ही दांव पर लगा दिया ? क्या महाविद्यालयीन साथियों एवं सहयोगियों का व्यवहार या असहयोग ही उनकी मौत का कारण रहा है ? क्या अपनों की कथित प्रताड़ना इतनी भारी पड़ सकती है कि प्राचार्य को आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ा। इन तमाम मसलों एवं संबंधित मुद्दों की विवेचना और पड़ताल इसलिए जरुरी है, क्योंकि इस तरह के दर्जनों सवाल खड़े होते हैं, जो इस आत्महत्या से उठे एवं उपजे चिंताओं को उजागर करते हैं।

उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ते दबाव एवं तनाव की वजह क्या ?

हल्का तनाव है फायदेमंद

उच्च शिक्षा सेवा में पिछले तीन-चार सालों से लगातार बढ़ते दबाव एवं तनाव की मुख्य वजह राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की कार्यशैली एवं कार्यसंस्कृति है। राज्य के तमाम अन्य विभागों की तरह इस विभाग में भी नौकरशाही हावी है, जिसके चलते अनेकों गैर-जरूरी निर्णय लिये जा रहे हैं।

उच्च शिक्षा विभाग के निर्णयों में महाविद्यालयों के प्राचार्यों एवं प्राध्यापकों की अनदेखी करते हुए तमाम महत्वपूर्णं निर्णय मंत्रालयों, सचिवालयों एवं विश्वविद्यालय स्तर पर लिये जा रहे हैं, और इन निर्णयों को महाविद्यालयों पर दबावपूर्वक थोपा जा रहा है।

अध्ययन-अध्यापन, परीक्षा जैसे महत्वपूर्णं कार्यों में प्राचार्यों की भूमिकाओं की अवहेलना एवं अनदेखी कोरोना कालखण्ड में चरम पर देखी गई है। सारे निर्णय उपर से थोपे जाने से प्राचार्यों पर अनावश्यक प्रशासनिक दबाव बढ़ता जा रहा है। इस घटना के पीछे भी इस तरह की वजह से इंकार नहीं किया जा सकता है।

क्रमशः

(लेखक; प्राध्यापक, अर्थशास्त्री, मीडिया पेनलिस्ट, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक एवं विमर्शकार हैं)

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