प्रकृति ने दया को सेतु का दायित्व सौंपा है

समस्त शाश्वत गुणों व विकारों की भयंकरता के मध्य प्रकृति ने दया को सेतु का दायित्व सौंपा है ताकि सह-अस्तित्व के माध्यम सृष्टि को विनाश से बचाया जा सके।

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दया का भाव समस्त प्राणियों में होती है। सिंह शावकों के साथ भेड़िये के बच्चे भी पले दिखाई देते हैं या स्वभाव में विपरीत तथा एक-दूसरे के लिए हिंसक मादा पुशओं को भी अन्य पशु के शिशुओं का दुग्धपान कराते देखा जा सकता है। इसका अर्थ ही यही है कि समस्त शाश्वत गुणों व विकारों की भयंकरता के मध्य प्रकृति ने दया को सेतु का दायित्व सौंपा है ताकि सह-अस्तित्व के माध्यम सृष्टि को विनाश से बचाया जा सके।

दया

मानव के समस्त गुणों में दया को उपकार की तरह ही रत्न माना गया है क्योंकि यह व्यक्ति को व्यक्ति के निकट तो लाती ही है साथ ही एक संवेगात्मक संबंध स्थापित करने में भी उत्प्रेरक का काम करती है |

प्राय: अधिकांश दया तथा संवेदना को समनार्थी मानते हैं जबकि भावों की गूढ़ता के परिप्रेक्ष्य में संवेदना एक बाह्य अनुभूति है और दया एक शाश्वत कल्याणकारी कर्मयुक्त आंतरिक दर्शन है अर्थात् संवेदना भावना प्रबल है तो दया हृदय के अत्यन्त सन्निकट प्राणी मात्र के लिए एक आत्मीय कचोट है।

दया की तीव्रता सतोगुणी, रजोगुणी तथा तमोगुणी में अलग-अलग होती है क्योंकि विकारों की अधिकता या न्यूनता इसकी गति को प्रभावित करती है। समस्त प्रकार के विकार तमो गुणी में होते हैं उससे कम रजोगुणी में तथा न्यूनतम सतोगुणी में है। अतः दया का भाव भी अधिक मध्यम तथा न्यून होते हैं क्रोधी, लोभी दया के प्रति उदासीन भाव रखते हैं क्योंकि उनके लिए उनकी प्राप्ति तथा अहम प्रमुख होता है। यही कारण है कि उनमें पारस्परिक बंधुत्व का भाव तथा साहचर्य की कमी तो होती है साथ ही उनमें अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा तथा कलह भी अधिक होती है जबकि दया, तनाव, दबाव, भय तथा आतंक के प्रभाव को नष्ट करने की क्षमता से युक्त होती है |

सभी धर्मों में दया को प्राथमिकता दी गई है क्योंकि इसे मानसिक सहिष्णुता का प्रतीक माना गया हैं। इसलिए सभी धर्मों में निष्ठुरता की आलोचना की गई है। जैसे बंजर भूमि से फसल उत्पादन की अपेक्षा नहीं की जाती वैसे ही निष्ठुरता में दया की कल्पना नहीं की जाती।

कुछ धर्मों में तो दया को ही मानवता के लिए सर्वोपरि माना गया है जब तक वह प्राणी जगत के प्रति दया का भाव न रखे, धर्म नहीं हो सकता। यहां प्राणी का आशय केवल मनुष्य नहीं  अपितु समस्त प्राण तत्व ही माना जाता है।

हिन्दू धर्म में दया के भाव को प्राणों से भी बढ़कर माना गया है। शरण में आने वाले के प्रति तीव्र सहिष्णुता दया की सर्वोच्चता को स्वीकार करना ही है। प्राणी विशेषकर मनुष्य के लिए प्राणों का मोह सर्वाधिक होता है। वह किसी भी मूल्य पर न तो प्राणों को त्यागना चाहता न ही इस पर किसी प्रकार का संकट ही वह स्वीकार कर सकता है

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दया का भाव समस्त प्राणियों में होती है। सिंह शावकों के साथ भेड़िये के बच्चे भी पले दिखाई देते हैं या स्वभाव में विपरीत तथा एक-दूसरे के लिए हिंसक मादा पुशओं को भी अन्य पशु के शिशुओं का दुग्धपान कराते देखा जा सकता है। इसका अर्थ ही यही है कि समस्त शाश्वत गुणों व विकारों की भयंकरता के मध्य प्रकृति ने दया को सेतु का दायित्व सौंपा है ताकि सह-अस्तित्व के माध्यम सृष्टि को विनाश से बचाया जा सके।

दया की अत्यन्त शक्ति ही विश्व व ब्रम्हाण्ड में धर्म व शांति की रक्षा करती है, यह एक निर्विवाद सत्य है। क्षमा, उपकार, प्रेम, अनुराग के अतिरिक्त शांति भक्ति तथा धर्म भी दया पर अवलंबित है अन्यथा ये सभी प्रचंड विकारों के समक्ष गौड़ होकर अर्थहीन हो जाते हैं। हम वत्सलता, मातृत्व या करूणा की कल्पना करते हैं वे सभी दया के ही तो रूप हैं।

प्राणियों में दया का उतना ही महत्व है जितना शरीर में आत्मा का। बिना आत्मा के शरीर का अर्थ ही मृत्यु है तभी तो मृत्यु को जीवन का अंत माना गया है। आत्मा की तरह समस्त सात्विक भाव यथा- क्षमा, दया, उपकार, करूणा, संवेदना, भक्ति अनश्वर है। इनकी अनश्वरता ही तो सृष्टि को गतिमान बनाये रखी है। अन्यथा प्राणी के विकार यथा- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मत्सर ज्वाजल्य पिंड की तरह सृष्टि को पल भस्म कर दे।

दया के लिये भी व्यक्ति में पात्रता होनी चाहिये। प्रत्यक्ष दर्शन तो मन को दया करने के लिए मन को प्रेरित करता है किंतु परोक्ष में उसके कर्म दया की पात्रता से वंचित कर देते हैं। ऐसी ही स्थितियां न्यायालयों में प्राय: देखने को मिलती है। अपराधी कम उम्र का होता है या उस पर ही पारिवारिक उत्तर दायित्व के निर्वहन का भार होता है। परिस्थितिजन्य अपराध वह कर बैठता है। उस पर दया आती है किंतु कदाचित इसीलिए न्याय की मूर्ति की आंखों में पट्टी बंधी होती है तथा प्रावधान भी कर दिया गया है ‘ अन-नोइंट लॉ इज नो एक्स्युज. ‘ या ‘इमोसन डजनाट प्ले एनी रोल इन डिसिजन, ‘

तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।’ स्पष्ट है कि पर-पीड़क दया नहीं कर सकते तथा पर-पीड़ा को अधर्म कार्य माना गया है। दया भाव रखकर ही व्यक्ति को पर-पीड़ा से मुक्त करना धर्मगत है तथा यही दया भी।

शाश्वत क्रोध भी भय के माध्यम से दया के रूप में शांत होता है | इसका सीधा सा अर्थ है कि भय और दया के मध्य सामंजस्य होता है तथा भय ही क्रोध की प्रचंड अग्नि को शांत कर दया का स्वरूप प्रदान करता है।

दया के लिए व्यक्ति में सौहार्द्र तथा संवेदना जैसे गुण का होना आवश्यक है। दया के लिए जिवाब का मूल्य गौड़ हो जाता है  तथा मानव मूल्य महत्वपूर्ण हो जाते हैं। परिणाम की चिंता अर्थहीन हो जाती है। व्यक्ति अन्य पर दया तो करता ही है, अपने प्रति भी दया भाव चाहता है। वक्त आने पर वह अपने लिए रहम अर्थात् दया की ही कामना करता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विकारों के प्रभाव व्यक्ति पर अस्थायी प्रभाव छोड़ते हैं तथा जैसे-जैसे उसकी शक्ति क्षीण होती है उसका क्रोध, अहंकार, मोह तथा आतंक भी निष्प्रभावी होता जाता है किंतु दया का भाव स्थायी प्रभाव छोड़ता है।

 

छत्तीसगढ़ के पिथौरा जैसे कस्बे  में पले-बढ़े ,रह रहे लेखक शिव शंकर पटनायक मूलतःउड़ियाभासी होते हुए भी हिन्दी की बहुमूल्य सेवा कर रहे हैं। कहानी, उपन्यास के अलावा  निबंध  लेखन में आपने कीर्तिमान स्थापित किया है। आपके कथा साहित्य पर अनेक अनुसंधान हो चुके हैं तथा अनेक अध्येता अनुसंधानरत हैं। ‘ निबंध संग्रह भाव चिंतन  के  निबंधों का अंश  deshdigital  उनकी अनुमति से प्रकाशित कर रहा है |

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