छत्तीसगढ़ महाविद्यालयीन अतिथि व्याख्याताओं ने माँगों को लेकर राजधानी रायपुर में किया धरना-प्रदर्शन 

छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों में अतिथि व्याख्यान व्यवस्था से संलग्न अतिथि व्याख्याताओं ने अपनी लम्बित माँगों को लेकर राजधानी के बूढ़ा तालाब धरना स्थल पर धरना-प्रदर्शन किया ।  निर्धारित योजना के अनुसार उन्हें उच्च शिक्षा मंत्री का घेराव करने जाना था जिसे प्रशासन ने बूढ़ा तालाब सड़क पर ही रोक दिया

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रायपुर । छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों में अतिथि व्याख्यान व्यवस्था से संलग्न अतिथि व्याख्याताओं ने अपनी लम्बित माँगों को लेकर राजधानी के बूढ़ा तालाब धरना स्थल पर धरना-प्रदर्शन किया ।  निर्धारित योजना के अनुसार उन्हें उच्च शिक्षा मंत्री का घेराव करने जाना था जिसे प्रशासन ने बूढ़ा तालाब सड़क पर ही रोक दिया । इससे पहले 28.09.2021 को भी एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया गया था । अतिथि व्याख्याता अपनी तीन माँगों को लेकर आन्दोलनरत हैं । इन माँगों में कार्यस्थल पर तत्काल पुनर्नियुक्ति , सत्र भर ग्यारह माह की सेवा और विभागीय स्थानान्तरण एवं लोक सेवा आयोग की नवीन पदस्थापना से सुरक्षा शामिल है । विदित है , कि अतिथि व्याख्याता 31.07.2021 से कार्यमुक्त होकर बेरोजगार हैं ।

इस व्यवस्था में दो दशक से भी अधिक समय से संलग्न वरिष्ठ अतिथि व्याख्याता डॉ. प्रवीण गुप्ता एवं डॉ. सुबोध देवाँगन ने बताया कि छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा रसातल में है । प्रदेश के ढाई सौ से अधिक शासकीय महाविद्यालयों में विभिन्न विषयों में लगभग 3000 अतिथि व्याख्याता संलग्न हैं । इनमें 23 – 24 वर्ष की अवस्था से लेकर अधिकतम 57 – 58 वर्ष की अवस्था तक के अतिथि व्याख्याता शामिल हैं । चूँकि शासन अपने पूरे रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्ति के लिए कभी गम्भीर नहीं रही है । इसलिए युवा स्नातकोत्तर उपाधि धारण करते ही रिक्त पदों पर इस व्यवस्था से संलग्न हो जाते हैं ।

शुरुआत हमेशा शून्य से होती है । इस दृष्टि से जहाँ एक ओर नये संलग्न अतिथि व्याख्याता मात्र स्नातकोत्तर उपाधि धारक होते हैं वहीं दूसरी ओर लगभग 30 वर्ष की अवस्था पार कर चुके अधिकतर अतिथि व्याख्याता सेट / नेट / पी-एच. डी. अथवा इनमें से एक से अधिक या सभी योग्यता हासिल कर चुके हैं । ये लगातार उच्च शिक्षा विभाग की व्यवस्था को बनाये हुए हैं किन्तु विभागीय स्तर पर इनके स्थायित्व के लिए न कभी कोई पहल हुई न ही कोई योजना अथवा नीति बनायी गयी । आज भी इनकी दशा , दिशा और भविष्य को लेकर न शासन गम्भीर है और ही न विभाग के पास कोई कार्य योजना है ।

डॉ. प्रवीण गुप्ता एवं डॉ. सुबोध देवाँगन  का कहना है कि सच्चाई यह है , ये अतिथि व्याख्याता ही उच्च शिक्षा विभाग की रीढ़ हैं । संयुक्त मध्यप्रदेश के समय से विगत तीस वर्षों से जारी यह व्यवस्था अंशकालीन , मानसेवी , संविदा , जनभागीदारी जैसे विभिन्न पद नामों से सम्बोधित होता हुआ आज अतिथि व्याख्यान व्यवस्था के नाम से प्रचलित है । इस व्यवस्था में प्रति पीरियेड ₹ 200 एक दिन में अधिकतम ₹ 800 और एक माह में अधिकतम ₹ 20800 मानदेय दिया जाता है । ₹ 20800 एक आदर्श स्थिति है , जो एक सत्र में एकाध बार ही सम्भव हो पाता है । सामान्यतः एक माह में सत्रह अठारह हजार रुपये ही मानदेय प्राप्त होता है ।

उन्होंने कहा ,अतिथि व्याख्याताओं को किसी भी प्रकार से किसी अवकाश की कोई पात्रता नहीं है । मातृत्व अवस्था में भी महिला व्याख्याताओं के साथ कोई संवैधानिक एवं मानवीय व्यवहार नहीं होता । इन्हें साल में मात्र छह माह सेवा में रखा जाता है और बाकी छह माह ये बेरोजगारी का दंश झेलने अभिशप्त हैं । आज इन्हें जो मानदेय दिया जाता है , वह दस वर्षों पूर्व निर्धारित है । दस वर्षों से उसमें न किसी प्रकार से कोई बढ़ोत्तरी हुई है और ही न समय सापेक्ष उसकी कभी कोई समीक्षा हुई । इस व्यवस्था में तीन वर्षों से लेकर तीस वर्षों तक निरन्तर अध्यापन कर चुके सुदीर्घ अनुभवी संलग्न हैं ।

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जारी विज्ञप्ति के मुताबिक नियमित सहायक प्राध्यापक अपनी सुविधानुसार साधन सम्पन्न जगहों पर पदस्थ होते रहते हैं । ऐसी स्थिति में ये अतिथि व्याख्याता ही दूरस्थ एवं साधन सुविधा विहीन क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की व्यवस्था को बनाये हुए हैं । इन्हें भले ही अतिथि व्याख्याता के रूप में नियुक्ति दी जाती है , किन्तु इनसे शैक्षणिक एवं गैर शैक्षणिक सभी तरह का कार्य लिया जाता है । वार्षिक परीक्षा में यदि ये मूल्यांकन कार्य न करें तो विश्वविद्यालय परीक्षा परिणाम कभी घोषित ही नहीं कर पायेगा । अभी सभी महाविद्यालयों में नैक मूल्यांकन किया जा रहा है । नैक मूल्यांकन की पूर्व तैयारी में सभी अतिथि व्याख्याता सेवा दिवस में हर तरह से सहयोग करते हैं ।

यह सोचनीय है , कि छत्तीसगढ़ उच्च शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और संचालनालय में पदस्थ अधिकारी अपने मानवीय संसाधन को मजबूत करने की दिशा में ध्यान क्यों नहीं देते । प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों के मासिक वेतन से कम मानदेय देकर छत्तीसगढ़ उच्च शिक्षा में किस तरह स्तर को गुणवत्तापूर्ण बनाया जा सकता है ? यह विभाग से सम्बन्धित जिम्मेदार लोग ही बता सकते हैं । अस्थिर एवं रुग्ण मानसिकता से उच्च शिक्षा की क्या उपलब्धि हो सकती है ? यह स्वतः स्पष्ट है । छत्तीसगढ़ राज्य गठन से लेकर अब तक सभी सरकारों से लगातार अनुनय विनय करने के बाद भी शोषण का यह अन्तहीन सिलसिला अद्यपर्यन्त अनवरत है । बहरहाल अतिथि व्याख्याताओं ने शोषण से मुक्ति एवं अपनी आजीविका की बेहतरी के लिए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है ।

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दुर्भाग्य यह है , कि ये नियोजन की दृष्टि से किस वर्ग में आते हैं ? यह तय ही नहीं है । शासन न इन्हें नियमित कर्मचारी मानती है और ही न अनियमित कर्मचारी । न ये श्रमिक की श्रेणी में आते हैं , न ये दैनिक वेतनभोगी कहलाते हैं , न ही ये संविदा कर्मी हैं और ही न अस्थायी की श्रेणी में हैं । ये अतिथि व्याख्याता वे समस्त दायित्व जिम्मेदारी पूर्वक करते हैं , जो नियमित सहायक प्राध्यापक करते हैं । लगभग सभी क्षेत्रों में नियमित कर्मियों से इनका प्रदर्शन और परिणाम बेहतर है ।

कोविड काल में भी इन्हें मार्च 2020 से फरवरी 2021 तक किसी प्रकार से कोई मानदेय , राहत राशि या आर्थिक सहायता नहीं दिया गया । शासकीय घोषणाएँ नेपथ्य में रहीं । इनकी दशा में सुधार के लिए ध्यानाकर्षण के बावजूद न माननीय उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया और न ही माननीय उच्चतम न्यायालय ने । ऐसा प्रतीत होता है , लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवस्थापिका , न्याय पालिका , कार्यपालिका सभी इनके  शोषण को स्थायी रूप से बनाये रखना चाहते हैं ।

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