इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं

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इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं
-रामचरित मानस में लक्ष्मण ने परशुराम के स्वभाव पर व्यंग्य किया कि मुनिवर स्वयं को महान योद्धा मान रहे हैं।  मुझे अपना फरसा दिखाकर ही डराना चाहते हैं, वे कोई छुईमुई का पौधा नहीं हैं, जो तर्जनी ऊंगली  देखकर डर जाएंगे।
त्रेता युग था, तब तर्जनी दिखाने देने से कुम्हड़ा का नाश हो जाता था या कहें वह सड़ जाता था। आज भी आपको गांवों में तुलसीदास की ये पंक्तियां सुनाते लोग मिल जाएंगे। बुजुर्ग, बच्चों को भी कुम्हड़े की ओर तर्जनी दिखाने या इशारा करने से मना करते हैं।
खैर… यह तो माना जा सकता है कि त्रेता युग में भी ऊंगली   दिखाने की परंपरा रही होगी, ऊंगली  करना अपराध नहीं रहा होगा। द्वापर में कृष्ण भगवान की ऊंगली  में ही सुदर्शन चक्र फंसा रहा। वह भी तर्जनी में। पर वह सदा उध्र्वगामी रहा। इस युग में एक गुरूजी एक कदम आगे निकले, जो अपने दलित गरीब भक्त शिष्य की तर्जनी की पड़ोसी अंगूठे की ही दक्षिणा ले ली।
अब जरा कलयुग की ओर आएं। यहां तो पूरा कारोबार ऊंगली का है। कलयुग यानि कलपुर्जे वाला वैज्ञानिक युग, कलयुग यानि आज का काम कल पर टालने वाला। उंगलियां इस युग में आते-आते बहुत तेज-मारक हो गई हैं। सब कुछ संभव कर दिखाती हैं। दिखाने से लेकर करने करने तक। बिना ऊंगली  कोई काम नहीं होता। कठोर हो या छुईमुई हाथ वाली, सभी ऊंगली  दिखाते हैं, सभी ऊंगली   करते मिल जाएंगे। एक तरह से इसके बिना कोई काम हो नहीं सकता। नेता एक-दूसरे की ऊंगली   करके दिखाके ही कारोबार करते हैं, जीते और मरते हैं। इनके ऊंगली कटा शहीद होने की परंपरा चली आ रही है। अंगूठा दिखाना इनकी आदत में शामिल होता है। बेचारा अंगूठा उंगलियों की श्रेणी में शामिल हो अलग-थलग रहता है।
मोबाइल नामक यंत्र इस युग की सबसे बड़ी इजाद और जरूरत बन गई है।  नाना स्वरुप, रंग रुप, आकार-प्रकार में पूरी दुनिया में तेजी से घूर्णित, चलायमान, परिवर्तनकारी इस यंत्र का पूरा दारोमदार  ऊंगलियों पर टिका है। जिस तरह भगवान कृष्ण के हाथों सुदर्शन नामक मारक अस्त्र-शस्त्र था, बिल्कुल उसी तरह आज हर इंसान के हाथों विराजमान।
आसपास से बेखबर, झुकी हुईं आंखें, दोनों हाथों की उंगलियां तेजी से इस यंंत्र के हर छोर पर घूमती हुई, सड़कों, चौक-चौराहों, बागों-दूकानों में आपको मिल जाएंगी। चारी-चुगली, इश्क-विस्क, दंगा-फसाद,खोज-खबर, निगरानी-शैतानी,धर्म-अध्यात्म, खेल-कारोबार, आहार-विहार, सब कुछ इन्हीं उंगलियों से संचालित होता है। यानि अब सभी ऊंगली  करते हैं, सिर्फ दिखाते नहीं करके दिखाते हैं।

बस अब-इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं।

-डा. निर्मल कुमार साहू 

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